Monday, August 24, 2026

बैंकिंग सेक्टर में कर्ज की मांग तेज, लोन ग्रोथ चार साल के उच्च स्तर पर; डिपॉजिट बना चुनौती.

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नई दिल्ली: भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में कर्ज की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है। जून 2026 में समाप्त पहली तिमाही (Q1FY27) के दौरान बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ करीब 20 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह पिछले लगभग चार वर्षों में दर्ज सबसे तेज वृद्धि बताई जा रही है। हालांकि, दूसरी तरफ बैंक जमा (डिपॉजिट) की रफ्तार कर्ज वितरण की तुलना में कमजोर रहने से फंडिंग को लेकर चिंता बढ़ी है।

ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन की रिपोर्ट के अनुसार, लोन और डिपॉजिट की वृद्धि के बीच बढ़ते अंतर के कारण बैंकों का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (LDR) करीब एक दशक के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि बैंकों की जमा राशि का बड़ा हिस्सा कर्ज के रूप में इस्तेमाल हो रहा है।

जुलाई में भी कर्ज की मांग मजबूत

रिपोर्ट के मुताबिक जून तिमाही के बाद जुलाई में भी बैंकिंग सिस्टम में ऋण की मांग कमजोर नहीं हुई। इस बार कर्ज की जरूरत केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि उद्योग और सेवा क्षेत्र समेत कई हिस्सों में मांग देखने को मिली।

औद्योगिक कर्ज में बड़े कॉरपोरेट की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक ऋण में बड़े कॉरपोरेट की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत है। वहीं छोटे और मध्यम कारोबारियों की ओर से भी बैंक ऋण की मांग मजबूत बनी हुई है।

NBFCs भी बैंकों से ज्यादा कर्ज ले रही हैं

सेवा क्षेत्र में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की बैंक ऋण पर निर्भरता बढ़ी है। हाल के महीनों में NBFCs को दिए जाने वाले बैंक कर्ज में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।

बॉन्ड बाजार में अपेक्षाकृत ऊंची ब्याज दरों के बीच NBFCs के लिए बैंकों से सीधे फंड जुटाना अधिक आकर्षक विकल्प बन रहा है। इससे बैंकिंग क्षेत्र में क्रेडिट डिमांड को अतिरिक्त समर्थन मिल रहा है।

डिपॉजिट की धीमी रफ्तार बनी चिंता

बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जमा राशि की वृद्धि कर्ज की मांग के अनुरूप नहीं बढ़ रही है। हाल के समय में डिपॉजिट ग्रोथ में कुछ सुधार जरूर आया है, लेकिन यह अभी भी क्रेडिट ग्रोथ से पीछे है।

इस स्थिति में बैंकों के सामने कर्ज की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त फंड जुटाए रखने की चुनौती बनी हुई है। फिलहाल बैंकिंग क्षेत्र की कमाई पर इसका बड़ा दबाव नहीं दिख रहा है और लोन से होने वाली आय तथा जमा पर दिए जाने वाले ब्याज के बीच संतुलन बैंकों के लिए अनुकूल बना हुआ है।

NPA में कमी से बैंकों को फायदा

बैंकों के वित्तीय प्रदर्शन को कम फंसे हुए कर्ज यानी NPA और बेहतर क्रेडिट कॉस्ट से भी समर्थन मिल रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन वजहों से बैंकिंग सेक्टर का मुनाफा मजबूत स्थिति में है और यह पिछले करीब एक दशक के बेहतर स्तरों में शामिल है।

RBI की नीतियों पर रहेगी नजर

बर्नस्टीन का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान बैंकिंग क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन जारी रह सकता है। हालांकि, कर्ज और जमा की वृद्धि के बीच लगातार बढ़ता अंतर नियामकीय स्तर पर चिंता पैदा कर सकता है।

रिपोर्ट में संभावना जताई गई है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) साल के दूसरे हिस्से में कुछ नियमों को सख्त कर सकता है। ऐसी स्थिति में बैंकों की कर्ज वितरण की रफ्तार पर कुछ असर पड़ सकता है।

पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बैंकिंग सेक्टर की क्रेडिट ग्रोथ 13 से 15 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया गया है।

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