Saturday, May 30, 2026

8वें वेतन आयोग में पेंशन चुनने की आज़ादी और वीआरएस नियमों में बड़े सुधारों पर सरकार अगले दो महीनों में फैसला ले सकती है.

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8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) की समीक्षा बैठकों के बीच केंद्रीय कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आ रही है. सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के पेंशन ढांचे में एक ऐतिहासिक बदलाव करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. इस नए प्रस्ताव के तहत कर्मचारियों को यह आजादी मिल सकती है कि वे अपनी मर्जी और जरूरत के हिसाब से अपनी पसंद की पेंशन योजना चुन सकें.

कर्मचारी संगठनों और राष्ट्रीय यूनियनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि आगामी दौर की बैठकें इसी तरह सकारात्मक रहीं, तो अगले दो से चार महीनों के भीतर सरकार इस पर एक नीतिगत रूपरेखा तैयार कर सकती है. हालांकि, केंद्र सरकार की तरफ से अभी तक इस विषय पर कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है.

क्यों पड़ी इस नए विकल्प की जरूरत?
मौजूदा व्यवस्था के अनुसार, 1 जनवरी 2004 के बाद सरकारी सेवा में आने वाले अधिकांश केंद्रीय कर्मचारी अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के तहत आते हैं. एनपीएस एक अंशदायी मॉडल है, जो पूरी तरह से बाजार के जोखिम और रिटर्न पर निर्भर करता है. इसके विपरीत, पुरानी पेंशन योजना (OPS) में कर्मचारियों को अंतिम वेतन के आधार पर एक निश्चित और सुरक्षित मासिक पेंशन की गारंटी मिलती थी. वहीं, हाल ही में सरकार द्वारा लाई गई एकीकृत पेंशन योजना (UPS) इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच का रास्ता निकालती है.

अब कर्मचारी संगठन लगातार यह मांग कर रहे हैं कि किसी भी कर्मचारी पर कोई एक व्यवस्था जबरन थोपने के बजाय, उन्हें उनकी वित्तीय स्थिति और भविष्य प्राथमिकताओं के आधार पर योजना चुनने का मौका दिया जाए. इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों में रिटायरमेंट के बाद की आर्थिक सुरक्षा को लेकर भरोसा जगाना और अनिश्चितता को खत्म करना है.

NPS और UPS में क्या है मुख्य अंतर?
कर्मचारियों के लिए इन दोनों योजनाओं के अंतर को समझना बेहद जरूरी है:

पेंशन की गारंटी: एनपीएस (NPS) में पेंशन पूरी तरह बाजार के रिटर्न पर टिकी है, इसमें कोई निश्चित राशि तय नहीं होती. इसके विपरीत, यूपीएस (UPS) में 25 साल की न्यूनतम सेवा के बाद आखिरी बेसिक सैलरी का 50% निश्चित पेंशन के रूप में मिलने की गारंटी है.

सरकार का योगदान: दोनों ही योजनाओं में कर्मचारी का योगदान 10% ही रहता है, लेकिन सरकार का योगदान एनपीएस में 14% है, जबकि यूपीएस में इसे बढ़ाकर 18.5% किया गया है.

अतिरिक्त सुरक्षा: यूपीएस के तहत कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को 60% पारिवारिक पेंशन और महंगाई राहत (DR) का लाभ मिलता है, जो एनपीएस में सीधे तौर पर उपलब्ध नहीं है.

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के नियमों में भी सुधार की मांग
पेंशन के विकल्प के साथ-साथ, कर्मचारी यूनियन इस बार स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के नियमों को भी आसान बनाने पर जोर दे रहे हैं. आयोग के सामने यह प्रस्ताव रखा गया है कि यदि कोई कर्मचारी लंबी सेवा के बाद वीआरएस लेता है, तो उसे रिटायरमेंट के अगले ही दिन से बिना किसी रुकावट के सुनिश्चित पेंशन लाभ मिलना शुरू हो जाना चाहिए. एनपीएस जैसी व्यवस्था में समय से पहले रिटायरमेंट लेने पर फंड के भुगतान की शर्तें काफी पेचीदा हो जाती हैं, जिससे कर्मचारियों को आर्थिक तंगी का डर रहता है. यूनियनों का तर्क है कि देश की लंबी सेवा करने वाले कर्मचारियों को वीआरएस लेने पर कोई मानसिक या वित्तीय तनाव नहीं मिलना चाहिए.

वेतन से ज्यादा ‘रिटायरमेंट सुरक्षा’ पर फोकस
8वें वेतन आयोग की अब तक की बैठकों का रुख पिछले वेतन आयोगों से काफी अलग दिख रहा है. पहले जहां पूरा ध्यान सिर्फ फिटमेंट फैक्टर, बेसिक सैलरी में बढ़ोतरी और भत्तों पर होता था, वहीं इस बार पूरी चर्चा रिटायरमेंट के बाद के सुरक्षा तंत्र पर सिमट गई है. ‘ऑल इंडिया एनपीएस एम्प्लॉइज फेडरेशन’ (AINPSEF) सहित कई बड़े संगठनों ने आयोग के सामने साफ कर दिया है कि कर्मचारियों के बुढ़ापे को बाजार के उतार-चढ़ाव के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

आयोग देश के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में कर्मचारी संघों के साथ लगातार बैठकें कर रहा है. जैसे-जैसे यह बातचीत आगे बढ़ रही है, यह साफ होता जा रहा है कि आने वाले महीनों में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतनमान के साथ-साथ उनके सामाजिक और सेवानिवृत्ति सुरक्षा ढांचे में कई बड़े और दूरगामी बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

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