Saturday, October 3, 2026

31 अक्टूबर को होगा प्रथम राष्ट्रीय आदिवासी ओलंपियाड, कक्षा 1 से 10 तक के विद्यार्थियों को मिलेगा मौका.

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Ranchi News: आदिवासी विद्यार्थियों को उनकी भाषा, संस्कृति, परंपरा, इतिहास और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने के उद्देश्य से पहली बार राष्ट्रीय आदिवासी ओलंपियाड प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की जा रही है। आयोजकों के अनुसार देशभर में 31 अक्टूबर को परीक्षा होगी, जिसमें कक्षा 1 से 10वीं तक पढ़ने वाले आदिवासी विद्यार्थी हिस्सा ले सकेंगे।

प्रतियोगिता के आयोजन को लेकर रांची प्रेस क्लब में संवाददाता सम्मेलन सह बैठक हुई। इसमें झारखंड के साथ पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से आए प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम की जानकारी साझा की।

300 रुपये में होगा रजिस्ट्रेशन

ओलंपियाड में भाग लेने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए 300 रुपये का रजिस्ट्रेशन शुल्क निर्धारित किया गया है। आयोजकों के मुताबिक प्रतियोगिता का आयोजन आदिवासी विजडम ट्रस्ट और टीम धुमकुड़िया की ओर से किया जा रहा है।

परीक्षा के जरिए बच्चों को आदिवासी इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं, पारंपरिक ज्ञान और संवैधानिक विषयों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।

आदिवासी ज्ञान और परंपराओं को सहेजने पर जोर

संवाददाता सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज में ज्ञान की समृद्ध परंपरा रही है, जिसका बड़ा हिस्सा मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। बदलते सामाजिक परिवेश और बाहरी प्रभावों के कारण इस ज्ञान परंपरा के प्रभावित होने की चिंता भी व्यक्त की गई।

वक्ताओं के अनुसार आदिवासी समुदाय की पारंपरिक खेती, खान-पान और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी जानकारी का महत्व आज भी बना हुआ है। मड़ुआ जैसे पारंपरिक अनाज को अब व्यापक पहचान मिल रही है। वहीं, कई स्थानीय साग-सब्जियों और जंगल में मिलने वाली जड़ी-बूटियों के औषधीय उपयोग की जानकारी भी आदिवासी ज्ञान का हिस्सा रही है।

बच्चों को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने की जरूरत

कार्यक्रम में डॉ. सरस्वती गगराई ने आदिवासी बच्चों को अपनी भाषा, संस्कृति और सभ्यता से जोड़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की मौखिक साहित्य परंपरा को संरक्षित करने के लिए भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाना जरूरी है।

वहीं डॉ. आर्यन भगत ने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में अभी भी विकास की कई चुनौतियां मौजूद हैं। उनके मुताबिक समय के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी परंपरा और पारंपरिक ज्ञान को भी संरक्षित रखने की जरूरत है।

कई राज्यों के प्रतिनिधि रहे मौजूद

बैठक में रणनीति प्रमुख अजय केरकेट्टा, कोल्हान विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. मिनाक्षी मुंडा, लेखक महादेव टोप्पो और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी विभाग से जुड़े डॉ. अभय सागर मिंज समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

आयोजकों का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर की यह प्रतियोगिता आदिवासी विद्यार्थियों को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत के बारे में जानने के साथ-साथ उसे आगे बढ़ाने का अवसर देगी।

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