नई दिल्ली: भारतीय पूंजी बाजार नियामक, सेबी ने कॉरपोरेट कंपनियों के लिए ओपन मार्केट से शेयर बायबैक की प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने के लिए नए नियमों की अधिसूचना जारी कर दी है. यह नई व्यवस्था 1 अगस्त 2026 से प्रभावी होगी. इस कदम का मुख्य उद्देश्य कॉर्पोरेट जगत को पूंजी प्रबंधन के लिए अधिक लचीलापन देना, पारदर्शिता बढ़ाना और पूरी प्रक्रिया की कार्यकुशलता में सुधार करना है.
इससे पहले सेबी ने असमान शेयर
धारक कर-लाभ और कुछ अन्य चिंताओं के कारण साल 2025 में ओपन-मार्केट बायबैक को चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया था. हालांकि, टैक्स नियमों में हुए हालिया सुधारों के बाद नियामक ने इसे नए सुरक्षात्मक मानकों के साथ वापस लाने का निर्णय लिया है.
नए नियमों के प्रमुख प्रावधान और शर्तें:
समय सीमा में कटौती: सेबी के नए नोटिफिकेशन के अनुसार, अब ओपन मार्केट बायबैक प्रक्रिया को पुराना 6 महीने का समय नहीं मिलेगा. कंपनियों को सार्वजनिक घोषणा के 4 कामकाजी दिनों के भीतर ऑफर खोलना होगा और अधिकतम 66 कामकाजी दिनों के भीतर इसे पूरी तरह समाप्त करना होगा.
15% की अधिकतम सीमा: कंपनियां अपने स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय बयानों के आधार पर, अपनी कुल चुकता पूंजी और फ्री रिजर्व के 15 प्रतिशत से कम हिस्से का ही बायबैक कर सकेंगी.
लागत और अनुपालन में राहत: व्यापार सुगमता को बढ़ावा देने के लिए अब मर्चेंट बैंकर की नियुक्ति को स्वैच्छिक बना दिया गया है. यदि कोई कंपनी मर्चेंट बैंकर नियुक्त नहीं करती है, तो उसकी जिम्मेदारी कंपनी के आंतरिक अनुपालन अधिकारी, सेक्रेटेरियल ऑडिटर और वैधानिक ऑडिटर पर होगी. वैधानिक ऑडिटर ही एस्क्रो अकाउंट और फंड के प्रबंधन की निगरानी करेंगे.
निवेशकों की सुरक्षा और कर समानता
बाजार में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को रोकने के लिए, बायबैक अवधि के दौरान कंपनी के प्रमोटर्स या उनके सहयोगियों के शेयरों को आईएसआईएन (ISIN) स्तर पर फ्रीज रखा जाएगा. इसके अलावा, कोई भी कंपनी ऐसा बायबैक नहीं ला सकेगी जिससे न्यूनतम सार्वजनिक शेयरहोल्डिंग (MPS) के नियमों का उल्लंघन हो.
नए टैक्स ढांचे के तहत, अब बायबैक में शेयर टेंडर करने वाले निवेशकों पर उनकी वास्तविक कमाई के अनुसार ‘कैपिटल गेन्स टैक्स’ लगेगा. यह ठीक वैसा ही होगा जैसे सामान्य रूप से शेयर बाजार में शेयर बेचना. इससे उन शेयरधारकों के बीच का टैक्स अंतर समाप्त हो गया है जो बायबैक में भाग लेते थे और जो नहीं ले पाते थे.
सेबी के इस नीतिगत बदलाव से भारतीय कंपनियों को बाजार में मंदी या अतिरिक्त नकदी की स्थिति में अपने शेयरों की कीमतों को सहारा देने और शेयरधारकों को मूल्य वापस करने का एक कुशल अंतरराष्ट्रीय माध्यम दोबारा मिल गया है.


