हिंदू धर्म में सावन के महीने का विशेष महत्व है. यही वजह है इस पर्व को पूरे देश में इस महीने में भगवान शिव की पूजा के लिए मंदिरों में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक किया जाता है. सावन के महीने में सावन शिवरात्रि का खास महत्व है. इस दिन भगवान शंकर और मां पार्वती की विशेष पूजा की जाती है. भक्त दही, दूध घी, जल , शहद और गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक कर आशीर्वाद मांगते हैं.
इतना ही नहीं सावन शिवरात्रि पर भक्तों के द्वारा निशा काल में भगवान शिव की पूजा एवं भक्ति की जाती है. वहीं मंदिरों में भजन-कीर्तन और शिव विवाह का आयोजन किया जाता है. इस शुभ अवसर पर महादेव का जलाभिषेक किया जाता है.
अविवाहित लड़कियां अच्छे जीवनसाथी के लिए प्रार्थना करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने पति की भलाई की कामना करती हैं. सावन शिवरात्री को आध्यात्मिक और ज्योतिषीय रूप से भी अहम माना जाता है. वहीं रुद्राभिषेक जैसे अनुष्ठान कर्म संबंधी निगेटिविटी को दूर करते हैं. इस दिन गंगा नदीं में डुबकी लगाना पवित्र माना जाता है.
जानिए सावन शिवरात्रि कब है?
इस साल सावन शिवरात्रि की तिथि 23 जुलाई 2025, बुधवार को है. इस दिन चतुर्दशी तिथि 23 जुलाई 2025 को सुबह 04:39 बजे शुरू होकर 24 जुलाई 2025 को सुबह 02:28 बजे खत्म होगी.
सावन शिवरात्री का महत्व और पूजा विधि
सावन शिवरात्रि भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती है. हिंदू कैलेंडर में सबसे पवित्र दिनों में से यह एक है. यह सावन के पवित्र महीने के दौरान आती है, जो महादेव की पूजा के लिए समर्पित है.
माना जाता है कि यह दिन भगवान शिव और देवी पार्वती के मिलन का प्रतीक है. इसे यह समुद्र मंथन की लौकिक घटना से जोड़कर देखा जाता है जहां भगवान शिव ने दुनिया को बचाने के लिए विषपान कर लिया था.
किंवदंतियों के मुताबिक, सावन शिवरात्रि दो महान ब्रह्मांडीय शक्तियों शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है. उत्तर भारत में यह त्योहार विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां कांवरिया पवित्र नदियों से पवित्र गंगाजल लाते हैं और शिव मंदिरों में अभिषेक करते हैं.
सावन शिवरात्रि का अनुष्ठान एक दिन पूर्व शुरू हो जाता है, जिसमें भक्त त्रयोदशी पर केवल एक बार भोजन करते हैं. शिवरात्रि पर वे व्रत रखते हैं और आध्यात्मिक रूप से केंद्रित रहने का संकल्प लेते हैं.
साथ ही भगवान शिव की रात भर की पूजा शुरू करने से पूर्व भक्त दो बार स्नान करते हैं, एक बार सुबह और दूसरी बार शाम को. वहीं शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, शहद और गंगाजल चढ़ाया जाता है, जबकि प्रार्थना और मंत्र के उच्चारण आधी रात या उसके बाद तक जारी रहते हैं. भक्त अगले दिन सूर्योदय के बाद और चतुर्दशी तिथि खत्म होने से पूर्व अपना व्रत तोड़ते हैं, हालांकि कुछ लोग तिथि समाप्त होने तक इंतजार करते हैं.


