Rohtas Strawberry Farming: बिहार के रोहतास जिले में किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ स्ट्रॉबेरी जैसी नकदी फसलों की खेती में भी रुचि ले रहे हैं। कोचस प्रखंड की रेडिया पंचायत के रुपी गांव में कई किसान इस खेती से जुड़ चुके हैं। किसानों का कहना है कि सही तकनीक, बेहतर उत्पादन और बाजार में अच्छी मांग मिलने पर स्ट्रॉबेरी से अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है।
रुपी गांव में बढ़ रहा स्ट्रॉबेरी की खेती का चलन
रोहतास के रुपी गांव में किसानों ने पारंपरिक खेती के साथ नए विकल्प अपनाने शुरू किए हैं। यहां फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी से जुड़े कई किसान पिछले करीब छह वर्षों से स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। इससे पहले कुछ किसानों ने काला गेहूं और बटन मशरूम जैसी फसलों में भी काम किया था।
अब गांव के किसान स्ट्रॉबेरी के नए पौधे लगाने और खेती का दायरा बढ़ाने की तैयारी में जुटे हैं। इस फसल से होने वाली संभावित कमाई को देखते हुए आसपास के क्षेत्रों के किसानों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है।
4 लाख रुपये की लागत पर 12 लाख तक के उत्पादन का दावा
फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के सीईओ और किसान अशोक कुमार के अनुसार, एक हेक्टेयर में स्ट्रॉबेरी की खेती करने पर लगभग 3 से 4 लाख रुपये तक खर्च हो सकता है। उनका दावा है कि अनुकूल परिस्थितियों में इस क्षेत्रफल से करीब 12 लाख रुपये मूल्य की उपज प्राप्त हो सकती है।
उनके मुताबिक, सभी खर्चों को घटाने के बाद 7 से 8 लाख रुपये तक की कमाई संभव है। हालांकि, यह अनुमानित आंकड़ा है। वास्तविक मुनाफा फसल की गुणवत्ता, उत्पादन, बाजार भाव, मजदूरी, परिवहन और अन्य खर्चों पर निर्भर करेगा।
दूसरे जिलों के किसान भी जान रहे खेती की तकनीक
रुपी गांव में स्ट्रॉबेरी की खेती को लेकर दूसरे इलाकों के किसानों की दिलचस्पी बढ़ी है। जानकारी के अनुसार, बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी किसान यहां पहुंचकर खेती के तरीकों को समझ रहे हैं।
किसान पौधों की रोपाई, फसल की देखभाल और तैयार स्ट्रॉबेरी की बिक्री से जुड़ी प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं। इससे क्षेत्र में वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
कहां से आते हैं स्ट्रॉबेरी के पौधे?
किसान अशोक कुमार के मुताबिक, खेती के लिए महाराष्ट्र के महाबलेश्वर क्षेत्र की नर्सरी से स्ट्रॉबेरी के पौधे मंगाए जाते हैं। उन्होंने लाल बलुई और काली मिट्टी में भी इसकी खेती किए जाने की जानकारी दी है।
उनके अनुसार, सामान्य तौर पर 15 सितंबर से 31 अक्टूबर के बीच पौधों की रोपाई की जाती है। हालांकि, रोपाई का सही समय स्थानीय मौसम, किस्म और खेत की परिस्थितियों के अनुसार तय करना जरूरी है।
एक पौधे से 700 से 900 ग्राम फल मिलने की बात
अशोक कुमार के अनुसार, अनुकूल परिस्थितियों में स्ट्रॉबेरी के एक पौधे से लगभग 700 से 900 ग्राम तक फल प्राप्त हो सकते हैं। वास्तविक उत्पादन पौधे की किस्म, मौसम, सिंचाई, पोषण और देखभाल के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
इसलिए खेती शुरू करने से पहले किसानों को कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने और अपने क्षेत्र के अनुकूल किस्म का चयन करने की जरूरत है।
पटना, रांची और कोलकाता तक पहुंच रही उपज
शुरुआत में स्ट्रॉबेरी की बिक्री के लिए किसानों को बाजार और खरीदार तलाशने पड़ते थे। अब किसानों के मुताबिक, पटना, रांची और कोलकाता के व्यापारी भी खेतों से उपज खरीदने पहुंच रहे हैं। इससे तैयार फल को बाजार तक पहुंचाने में सुविधा मिल रही है।
स्ट्रॉबेरी जल्दी खराब होने वाली फसल है, इसलिए इसकी खेती में उत्पादन के साथ-साथ समय पर तुड़ाई, सुरक्षित पैकिंग, उचित भंडारण और बाजार तक तेज परिवहन भी अहम भूमिका निभाते हैं।
किसानों के लिए आय बढ़ाने का विकल्प
रोहतास के रुपी गांव में स्ट्रॉबेरी की खेती किसानों के सामने पारंपरिक फसलों से आगे बढ़ने का एक विकल्प पेश कर रही है। अच्छी पैदावार और भरोसेमंद बाजार मिलने पर इससे आमदनी बढ़ सकती है।
हालांकि, इसमें शुरुआती निवेश और बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम भी रहता है। ऐसे में किसानों के लिए बेहतर होगा कि वे खेती का क्षेत्र बढ़ाने से पहले लागत, स्थानीय जलवायु, पौधों की उपलब्धता और खरीदारों की मांग का आकलन कर लें। BHARATSUPERFASTNEWS
