रांची | 2 नवंबर 2026 | Bharat Superfast News
झारखंड हाईकोर्ट ने रांची के जालान रोड और अपर बाजार के दुकानदारों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने रांची नगर निगम की ओर से दुकानों के लाइसेंस रद्द करने और दुकानें खाली कराने से जुड़े पुराने आदेशों को निरस्त कर दिया है। साथ ही नगर निगम को संबंधित दुकानदारों का पक्ष सुनने और दस्तावेजों की जांच के बाद 12 सप्ताह के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने आठ रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि नगर निगम की ओर से नए सिरे से अंतिम निर्णय लिए जाने तक याचिकाकर्ताओं का दुकानों पर मौजूदा कब्जा प्रभावित नहीं किया जाएगा।
जालान रोड और अपर बाजार की दुकानों से जुड़ा था विवाद
मामला रांची के जालान रोड और अपर बाजार स्थित दुकानों तथा जमीन के लाइसेंस और पुनः आवंटन से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं ने नगर निगम के 14 अक्टूबर 2014 के लाइसेंस रद्द करने के आदेश, 4 दिसंबर 2014 के दुकान खाली करने के निर्देश और 13 फरवरी 2015 को जारी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
इनसे जुड़ी आठ याचिकाओं को एक साथ जोड़कर अदालत में सुनवाई की गई।
1966-67 में जमीन आवंटित होने का दिया गया हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने पक्ष रखते हुए बताया कि जालान रोड की करीब 5100 वर्गफीट जमीन वर्ष 1966-67 में तत्कालीन रांची नगरपालिका ने मोहन लाल कच्ची को आवंटित की थी। इस जमीन पर टेंट हाउस का कारोबार संचालित किया जा रहा था।
दलील के अनुसार, बाद में उनके उत्तराधिकारी महेंद्र कुमार कच्ची ने वर्ष 2000 में कुछ अन्य लोगों के साथ साझेदारी में कारोबार शुरू किया। साझेदारी समाप्त होने के बाद जमीन को संबंधित प्रार्थियों के नाम दोबारा आवंटित करने का अनुरोध किया गया था।
2003 में हुआ था पुनः आवंटन
याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि रांची नगर निगम ने 9 दिसंबर 2003 को जमीन प्रार्थियों के नाम आवंटित की थी। इसके बाद 5 जून 2004 को लाइसेंस शुल्क के आधार पर समझौता हुआ।
जमीन पर स्थायी निर्माण के लिए नगर निगम से अनुमति मांगी गई थी, जिसे 6 अगस्त 2004 को स्वीकृति मिलने की बात भी अदालत में रखी गई। बाद में दुकानों के पुनः आवंटन को लेकर विवाद पैदा हुआ।
इसके बाद निगम ने 9 सितंबर 2014 को कारण बताओ नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से जवाब दिए जाने के बावजूद 14 अक्टूबर 2014 को लाइसेंस रद्द करने और दुकानें खाली कराने का आदेश पारित किया गया था।
नगर निगम ने लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया
नगर निगम की ओर से अधिवक्ता राहुल कुमार ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन किया गया है और मामला दुकानों को किसी दूसरे पक्ष को देने यानी सबलेटिंग से जुड़ा है।
निगम की ओर से यह भी दलील दी गई कि संबंधित जमीन पर विकास कार्य कराने की आवश्यकता है। इसी आधार पर नगर निगम ने अपने आदेशों को उचित बताते हुए याचिकाएं खारिज करने का आग्रह किया।
आदेशों में कारण और दस्तावेजों पर विचार नहीं किया गया
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि नगर निगम का 14 अक्टूबर 2014 का आदेश केवल तीन पंक्तियों का था। उसमें याचिकाकर्ताओं की ओर से रखी गई दलीलों और दस्तावेजों पर समुचित विचार नहीं किया गया था।
अदालत ने 13 फरवरी 2015 के आदेश में भी तथ्यों पर पर्याप्त विचार नहीं किए जाने की बात पाई। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वैधानिक प्राधिकार को संबंधित पक्षों की दलीलों और उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार करने के बाद ही आदेश पारित करना चाहिए।
12 सप्ताह में नए सिरे से सुनवाई का निर्देश
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने नगर निगम के 14 अक्टूबर 2014, 4 दिसंबर 2014 और 13 फरवरी 2015 के आदेशों को निरस्त कर दिया। अदालत ने निगम को याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का उचित अवसर देने और सभी संबंधित दस्तावेजों पर विचार करने के बाद नया कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
इस पूरी प्रक्रिया को 12 सप्ताह के भीतर पूरा करना होगा। तब तक संबंधित दुकानों पर याचिकाकर्ताओं का मौजूदा कब्जा बरकरार रहेगा।
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