नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026: भारत में वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। 9 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित Earth5R की पर्यावरण संबंधी रिपोर्ट में विभिन्न शोधों और आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि वर्ष 2023 में भारत में वायु प्रदूषण से 20 लाख से अधिक मौतें जुड़ी थीं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण के कारण भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा पर भी गंभीर असर पड़ रहा है।
रिपोर्ट में वायु प्रदूषण को सालभर चलने वाली समस्या बताते हुए कहा गया है कि इससे निपटने के लिए केवल सर्दियों में आपातकालीन कदम उठाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण, स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर परिवहन व्यवस्था और नियमों के सख्त पालन की जरूरत है।
WHO के दिशानिर्देश से करीब 10 गुना अधिक PM2.5
रिपोर्ट में IQAir के 2025 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि भारत में वार्षिक औसत PM2.5 स्तर 48.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वार्षिक दिशानिर्देश सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से लगभग 10 गुना अधिक है।
PM2.5 हवा में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं, जो सांस के साथ फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं। इनके संपर्क में लंबे समय तक रहने से हृदय और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों सहित कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
IQAir की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत 143 देशों में वायु प्रदूषण के स्तर के लिहाज से छठे स्थान पर रहा। हालांकि, औसत PM2.5 स्तर 2024 के 50.6 से घटकर 2025 में 48.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हुआ, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक इस गिरावट को सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं माना गया।
दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के कई शहर
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के पांच शहर शामिल थे। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में स्थित लोनी में वार्षिक औसत PM2.5 स्तर 112.5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया।
रिपोर्ट में दिल्ली, गाजियाबाद और असम-मेघालय सीमा के पास स्थित बर्नीहाट का भी उल्लेख किया गया है। इसके अलावा, दुनिया के 100 सबसे प्रदूषित शहरों में 66 शहर भारत के होने की बात कही गई है।
नई दिल्ली को लगातार आठवें वर्ष दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार, यहां वार्षिक औसत PM2.5 स्तर 82.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।
सर्दियों में प्रदूषण का स्तर और बढ़ जाता है
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के सरकारी निगरानी आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच उत्तर भारत के कई शहरों में PM2.5 का स्तर काफी ऊंचा रहा।
रिपोर्ट में सर्दियों के औसत स्तर के तौर पर गाजियाबाद में 172, नोएडा में 166 और दिल्ली में 163 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर का उल्लेख किया गया है। तुलना में कोलकाता में 78, मुंबई में 48, चेन्नई में 44 और बेंगलुरु में 39 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर का स्तर दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सर्दियों में हवा की धीमी गति और तापमान संबंधी परिस्थितियों के कारण प्रदूषक जमीन के करीब जमा हो सकते हैं। हालांकि, ये परिस्थितियां प्रदूषण पैदा नहीं करतीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रदूषकों के फैलाव को सीमित कर सकती हैं।
प्रदूषण से जीवन प्रत्याशा पर असर
रिपोर्ट में एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (AQLI) के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि यदि भारत में PM2.5 का स्तर WHO के दिशानिर्देशों के अनुरूप हो जाए, तो औसत भारतीय की जीवन प्रत्याशा में करीब 3.5 साल की बढ़ोतरी संभव हो सकती है।
क्षेत्रीय अनुमानों के अनुसार, दिल्ली में यह संभावित लाभ 8.2 वर्ष, बिहार में 5.6 वर्ष, हरियाणा में 5.3 वर्ष और उत्तर प्रदेश में लगभग 5 वर्ष बताया गया है।
ये आंकड़े संभावित लाभ के मॉडल-आधारित अनुमान हैं। वास्तविक प्रभाव प्रदूषण के स्तर, लोगों के संपर्क और स्वास्थ्य संबंधी अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में 20 लाख से अधिक मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं। वहीं, लैंसेट काउंटडाउन के अनुमान में वर्ष 2022 के दौरान मानव गतिविधियों से उत्पन्न PM2.5 के कारण 17.2 लाख मौतों का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वर्ष 2021 में पांच साल से कम उम्र के लगभग 1,69,400 बच्चों की मौत वायु प्रदूषण से जुड़ी थी।
जीवाश्म ईंधन, परिवहन और कचरा जलाना प्रमुख स्रोत
रिपोर्ट में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल, सड़क परिवहन, घरेलू ईंधन, कृषि अवशेष जलाना, खुले में कचरा जलाना, औद्योगिक उत्सर्जन और धूल को शामिल किया गया है।
लैंसेट काउंटडाउन के अनुमान के अनुसार, 2022 में भारत में मानव गतिविधियों से उत्पन्न PM2.5 से जुड़ी मौतों में जीवाश्म ईंधन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। रिपोर्ट में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों और सड़क परिवहन में पेट्रोल के इस्तेमाल से जुड़ी मौतों के भी अनुमान दिए गए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण कम करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना, औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण और कचरे के उचित प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी।
दिल्ली में सर्दियों के दौरान हवा की स्थिति चिंताजनक
CREA द्वारा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, 1 अक्टूबर 2025 से 28 फरवरी 2026 के बीच दिल्ली में PM2.5 का औसत स्तर 163 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।
विश्लेषण किए गए 151 दिनों में से 105 दिन वायु गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ या ‘गंभीर’ श्रेणी में रही, जबकि केवल सात दिन ‘अच्छी’ या ‘संतोषजनक’ श्रेणी में दर्ज किए गए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2025-26 की सर्दियों के दौरान विश्लेषण किए गए 238 भारतीय शहरों में से 204 में PM2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानक से अधिक था। पिछली सर्दियों में ऐसे शहरों की संख्या 173 बताई गई थी।
पराली जलाने की घटनाओं में कमी, लेकिन निगरानी जरूरी
रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में 15 सितंबर से 30 नवंबर 2025 के बीच खेतों में आग लगाने की 5,114 घटनाएं दर्ज की गईं। यह संख्या 2024 की तुलना में 53 प्रतिशत और 2021 की तुलना में 93 प्रतिशत कम बताई गई है। हरियाणा में इसी अवधि के दौरान 662 घटनाएं दर्ज होने का उल्लेख है।
रिपोर्ट में पंजाब में धान के अवशेषों के उपयोग में वृद्धि की बात भी कही गई है। हालांकि, सैटेलाइट विश्लेषण के हवाले से यह आशंका जताई गई कि पराली जलाने की कुछ घटनाएं बाद के समय में हुई हों, जिससे आधिकारिक आंकड़ों पर असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने कृषि अवशेषों के वैकल्पिक इस्तेमाल के लिए बेहतर बाजार विकसित करने का सुझाव दिया है। इनमें बायोमास से बिजली उत्पादन, पैकेजिंग और ईंट भट्ठों में कृषि अवशेषों का उपयोग शामिल है।
वायु प्रदूषण से अर्थव्यवस्था को भी नुकसान
रिपोर्ट में वायु प्रदूषण के आर्थिक प्रभावों पर भी चिंता जताई गई है। लैंसेट काउंटडाउन के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में बाहरी वायु प्रदूषण के कारण समय से पहले हुई मौतों की आर्थिक लागत 339.4 अरब डॉलर आंकी गई, जो उस समय देश की GDP के लगभग 9.5 प्रतिशत के बराबर बताई गई।
एक अन्य अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2019 में समय से पहले मौतों और बीमारी के कारण उत्पादकता में कमी से 36.8 अरब डॉलर या GDP के लगभग 1.36 प्रतिशत के बराबर आर्थिक नुकसान हुआ था।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण का असर स्वास्थ्य खर्च, काम करने की क्षमता और आर्थिक उत्पादकता पर भी पड़ता है। इसलिए साफ हवा को स्वास्थ्य और विकास, दोनों से जुड़ा मुद्दा मानने की जरूरत है।
साफ हवा के लिए सरकारी खर्च और प्राथमिकताओं पर सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और 15वें वित्त आयोग के वायु गुणवत्ता अनुदान के तहत 13,415 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिनमें से 9,929 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
CREA के विश्लेषण में दावा किया गया है कि कुल खर्च का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा सड़क की धूल नियंत्रित करने पर लगा। परिवहन पर 14 प्रतिशत, कचरा और बायोमास जलाने से जुड़ी गतिविधियों पर 12 प्रतिशत तथा निगरानी और क्षमता निर्माण पर 3 प्रतिशत खर्च किए जाने की बात कही गई है। शेष 3 प्रतिशत अन्य कार्यों पर खर्च हुआ।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क की धूल पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन प्रदूषण के अन्य स्रोतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरे साल चलने वाली योजनाओं, वैज्ञानिक निगरानी, नियमों के सख्त पालन और सरकारी खर्च की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने पूरे साल कार्रवाई पर दिया जोर
पर्यावरण विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केवल सर्दियों में पाबंदियां लगाने के बजाय सालभर प्रदूषण के स्रोतों पर काम करना होगा।
उनके सुझावों में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार, कचरा प्रबंधन में सुधार, कृषि अवशेषों के वैकल्पिक इस्तेमाल को प्रोत्साहन और वायु गुणवत्ता की पारदर्शी निगरानी शामिल हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, साफ हवा को केवल पर्यावरणीय लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक उत्पादकता और पर्यावरणीय न्याय की बुनियादी जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए। वायु प्रदूषण नियंत्रण की सफलता का आकलन केवल खर्च की गई राशि या लगाई गई पाबंदियों से नहीं, बल्कि प्रदूषण के संपर्क में कमी और लोगों के स्वास्थ्य में सुधार के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
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