Patna News | 3 नवंबर 2026: पटना हाईकोर्ट ने योग गुरु स्वामी रामदेव पर लिखी किताब ‘गॉडमैन टू टायकून : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ स्वामी रामदेव’ के प्रकाशक जुगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड को बड़ी कानूनी राहत दी है। अदालत ने प्रकाशक के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का स्वामी रामदेव का अनुयायी होना मात्र उसे मानहानि के मामले में कानूनी रूप से पीड़ित नहीं बनाता।
न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने प्रकाशक की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।
2017 में हाजीपुर में दर्ज हुई थी शिकायत
पूरा मामला वर्ष 2017 का है। वैशाली जिले के हाजीपुर में अमित कुमार नाम के व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने खुद को स्वामी रामदेव का अनुयायी बताया था।
उनके मुताबिक, 1 सितंबर 2017 को बाजार में उन्हें संबंधित किताब दिखाई दी, जिसके बाद उन्होंने उसे खरीदा। शिकायत में आरोप लगाया गया कि पुस्तक में स्वामी रामदेव के पारिवारिक और सामाजिक जीवन के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं।
शिकायतकर्ता ने किताब में रामदेव को गरीब किसान का अनपढ़ बेटा बताए जाने और उनके भगवा वस्त्र धारण करने से संबंधित विवरण पर आपत्ति जताई थी। इसके अलावा पुस्तक में गुरु शंकरानंद, स्वामी योगानंद और राजीव दीक्षित की मौत को लेकर किए गए कथित उल्लेखों पर भी सवाल उठाए गए थे। शिकायतकर्ता का कहना था कि इन बातों से उनकी और हिंदू धर्म की भावनाएं आहत हुई हैं।
निचली अदालत ने किन धाराओं में लिया था संज्ञान?
हाजीपुर के अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-द्वितीय ने 7 अक्टूबर 2017 को शिकायत के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 295-A, 500, 501 और 502 के तहत संज्ञान लिया था। इसके बाद प्रकाशक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई।
इस आदेश को चुनौती देते हुए जुगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड ने पटना हाईकोर्ट का रुख किया।
प्रकाशक की ओर से क्या दलील दी गई?
प्रकाशक की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष गिरी ने अदालत में दलील दी कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 199(1) के तहत मानहानि से संबंधित शिकायत वही व्यक्ति कर सकता है, जिसे कथित रूप से बदनाम किया गया हो।
उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता पुस्तक में वर्णित व्यक्ति यानी स्वामी रामदेव नहीं हैं, बल्कि उनके अनुयायी हैं। इसलिए केवल अनुयायी होने के आधार पर उन्हें मानहानि का मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं मिल सकता।
इसके साथ ही बचाव पक्ष ने दलील दी कि भारतीय दंड संहिता की धारा 295-A के तहत कार्रवाई के लिए आवश्यक सरकारी अनुमति इस मामले में नहीं ली गई थी।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द की कार्यवाही?
अदालत ने दलीलों और शिकायत की सामग्री पर विचार करते हुए पाया कि शिकायत में शिकायतकर्ता अमित कुमार के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। पुस्तक में जिन बातों को लेकर आपत्ति जताई गई, वे स्वामी रामदेव से संबंधित थीं।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि गुरु के कथित अपमान से शिष्य का आहत होना उसे मानहानि के मामले में कानूनी रूप से पीड़ित व्यक्ति का दर्जा नहीं देता।
अदालत के अनुसार, ऐसी स्थिति में आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के संज्ञान आदेश और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
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