मुंबईः बदलती जीवनशैली के साथ पैकेज्ड फूड, फास्ट फूड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ रही है। ऐसे भोजन में मौजूद अधिक मात्रा में नमक, चीनी और तेल का सेवन लंबे समय में स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और खून में वसा के असंतुलन जैसी समस्याओं का संबंध किडनी समेत कई अंगों की सेहत से हो सकता है।
मुंबई के सैफी हॉस्पिटल के कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. हेमल शाह के मुताबिक, खान-पान की आदतें लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों के बढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लंबे समय तक ऐसी समस्याएं रहने पर किडनी और हृदय से जुड़ी बीमारियों के साथ मेटाबोलिक-एसोसिएटेड फैटी लिवर डिजीज का जोखिम भी बढ़ सकता है।
SOS अभियान में नमक, तेल और चीनी पर जोर
डॉ. हेमल शाह के अनुसार, पैकेज्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में मौजूद नमक, तेल और चीनी की मात्रा कई बार लोगों के ध्यान में नहीं आती। इसी जागरूकता को बढ़ाने के लिए मुंबई किडनी फाउंडेशन और अमर गांधी फाउंडेशन से जुड़े नेफ्रोलॉजिस्ट की ओर से SOS अभियान शुरू किया गया है।
SOS में तीन प्रमुख चीजों को शामिल किया गया है:
- S – Salt (नमक): पैकेज्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में सोडियम की मात्रा अधिक हो सकती है। ज्यादा सोडियम का सेवन हाई ब्लड प्रेशर के जोखिम से जुड़ा है, जो किडनी पर भी असर डाल सकता है।
- O – Oil (तेल): कुछ प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में सैचुरेटेड और ट्रांस फैट की मात्रा अधिक हो सकती है। इनका अधिक सेवन मोटापे और हृदय संबंधी जोखिमों से जुड़ा है।
- S – Sugar (चीनी): कोल्ड ड्रिंक्स, केचप और पैकेज्ड स्नैक्स जैसे उत्पादों में अतिरिक्त या छिपी हुई चीनी हो सकती है। ज्यादा चीनी का सेवन डायबिटीज और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को बढ़ा सकता है।
पैकेज्ड फूड से अनजाने में बढ़ जाता है सेवन
विशेषज्ञों के मुताबिक, घर के खाने में लोग नमक, तेल और चीनी की मात्रा पर अपेक्षाकृत आसानी से नजर रख सकते हैं, लेकिन पैकेज्ड या बाहर के खाने में इनकी मात्रा का अंदाजा लगाना मुश्किल हो सकता है।
डॉ. शाह ने पैकेज्ड स्नैक्स में नमक की अधिक मात्रा का उदाहरण देते हुए आलू के चिप्स के एक पैकेट का जिक्र किया, जिसमें उनके अनुसार करीब 15 ग्राम नमक हो सकता है। उन्होंने इसे रोजाना नमक सेवन की अनुशंसित सीमा के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया।
किडनी की बीमारी शुरुआती दौर में दे सकती है कम संकेत
डॉ. हेमल शाह ने किडनी की बीमारी को लेकर समय रहते जांच और सावधानी की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, किडनी की बीमारी शुरुआती चरणों में स्पष्ट लक्षणों के बिना भी आगे बढ़ सकती है। यही वजह है कि इसे कई बार ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है।
किडनी की बीमारी को आम तौर पर अलग-अलग चरणों में बांटा जाता है। शुरुआती चरणों में बीमारी की पहचान होने पर इलाज, नियमित निगरानी और जीवनशैली में बदलाव के जरिए इसके बढ़ने की रफ्तार को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से बढ़ सकता है जोखिम
डॉक्टर ने 2008–2009 की एक स्टडी का हवाला देते हुए बताया कि उस समय करीब हर 10 में से एक वयस्क किडनी की बीमारी से प्रभावित पाया गया था। उनके अनुसार डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे के बढ़ते मामलों के बीच किडनी की बीमारी का बोझ भी बढ़ सकता है।
इन स्वास्थ्य समस्याओं पर नियंत्रण रखने के लिए खान-पान, शारीरिक गतिविधि और नियमित स्वास्थ्य जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
क्रोनिक किडनी डिजीज का असर सिर्फ किडनी तक सीमित नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक रहने वाली क्रोनिक किडनी बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंचने पर डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत तक पैदा कर सकती है। इसका संबंध हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी गंभीर समस्याओं से भी हो सकता है।
ऐसे में पैकेज्ड फूड खरीदते समय नमक, चीनी और फैट की मात्रा वाले पोषण संबंधी लेबल पर ध्यान देना, संतुलित भोजन लेना और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों को नियंत्रित रखना स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
BharatSuperFastNews | हेल्थ डेस्क
