नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से आग्रह किया है कि वे डॉलर में खरीदे गए उत्पादों का इस्तेमाल ज़्यादा समझदारी से करें और अनावश्यक उपभोग से बचें. विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के बीच, भारत का चालू खाता घाटा दबाव में आ सकता है.
ऐसी स्थिति में सरकार आयातित वस्तुओं और कमोडिटीज के अत्यधिक उपभोग को रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाती दिख रही है, जिनके लिए बड़ी मात्रा में डॉलर खर्च करने की जरूरत होती है. कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं, आपूर्ति में रुकावटों और आयात की बढ़ी हुई लागत के कारण आने वाले महीनों में कुछ वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं.
उनके अनुसार सरकार के इस संदेश का उद्देश्य लोगों को संभावित महंगाई के दबाव के लिए तैयार करना और परिवारों को अपने खर्च की योजना ज़्यादा सावधानी से बनाने के लिए प्रोत्साहित करना भी है.
PM ने क्या कहा?
10 मई, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से आग्रह किया कि वे पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, वैश्विक ऊर्जा में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन में रुकावटों से पैदा हो रहे आर्थिक दबावों को देखते हुए, खर्च करने और उपभोग करने की आदतों में ज़्यादा सावधानी बरतें.
सिकंदराबाद में एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम ने लोगों से अपील की कि वे ईंधन का इस्तेमाल कम करें, जहाँ तक हो सके मेट्रो जैसे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें, जब मुमकिन हो तो ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) की व्यवस्था अपनाएं और एक साल तक गैर-जरूरी विदेश यात्रा से बचें.
उन्होंने लोगों को सोने की खरीदारी टालने की भी सलाह दी, और इस बात पर ज़ोर दिया कि विदेशी मुद्रा बचाना और आयात पर दबाव कम करना जरूरी है. पीएम मोदी ने कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद से वैश्विक संघर्षों और रुकावटों ने सप्लाई चेन पर दबाव डाला है और दुनिया भर के देशों में कीमतें बढ़ा दी हैं.
इस पृष्ठभूमि में उन्होंने सामूहिक संयम और ‘कर्तव्य पहले’ की सोच अपनाने का आह्वान किया, और साथ ही यह भी कहा कि सरकार ने भारतीय उपभोक्ताओं को वैश्विक तेल की बढ़ती कीमतों के पूरे असर से बचाने के लिए काम किया है.
पश्चिम एशिया संकट के बीच आर्थिक चिंताएं
अर्थशास्त्री और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने ईटीवी भारत को बताया कि तेल की बढ़ती कीमतें और पश्चिम एशिया में चल रहे संकट ने भारत के बाहरी खाता संतुलन को और भी ज़्यादा कमजोर बना दिया है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर चालू खाता घाटा और बढ़ता है, तो रुपया और भी ज़्यादा कमज़ोर हो सकता है.
कुमार ने कहा कि मौजूदा हालात में प्रधानमंत्री की अपील अहम है, क्योंकि आयातित सामानों की खपत कम करने से विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है. उन्होंने कहा, ‘अगर हम उन आयातों को कम कर पाते हैं जिनसे बचा जा सकता है, तो इससे निवेश को बढ़ावा मिलेगा और रुपये को कमज़ोर होने से रोकने में भी मदद मिलेगी.’
उन्होंने आगे कहा कि अर्थव्यवस्था के इस दौर में ऐसे कदम उठाना जरूरी है. उन्होंने यह भी साफ किया कि जरूरी आयातों से तो बचा नहीं जा सकता, लेकिन जहाँ भी खपत कम की जा सकती है, लोगों को ऐसा करने की कोशिश करनी चाहिए. उर्वरकों का ज़िक्र करते हुए कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री ने बार-बार उनके ज़्यादा कुशल और संतुलित इस्तेमाल की अपील की है, और कहा कि इस सलाह का पालन करना अब फ़ायदेमंद साबित हो सकता है.
क्या ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी अब तय है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीने आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण रह सकते हैं. अगर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती है, तो ईंधन की कीमतों में एक और बढ़ोतरी की संभावना है. दिल्ली स्थित थिंक टैंक ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) की हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत को जल्द ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक और बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के निशान के आसपास बनी हुई है.
9 मई 2026 तक, ब्रेंट क्रूड वायदा 100 डॉलर से 101 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था, जबकि पिछले एक साल में इसमें भारी उतार-चढ़ाव देखा गया था, जो 58.72 डॉलर से लेकर 126.4 डॉलर प्रति बैरल तक रहा. रिपोर्ट में बताया गया है कि अप्रैल 2020 में कच्चे तेल की कीमतें कुछ समय के लिए 20 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे गिर गई थी, जो वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अत्यधिक अस्थिरता को दर्शाता है.
भारत के लिए जो अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है, इस तरह के उतार-चढ़ाव गंभीर व्यापक आर्थिक चुनौतियां पैदा करते हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आमतौर पर महंगाई बढ़ाती है, व्यापार घाटा बढ़ाती है, सरकारी वित्त पर दबाव डालती हैं.
परिवारों की खर्च करने की क्षमता कम करती है और समग्र आर्थिक विकास को धीमा करती हैं. ईटीवी भारत से बात करते हुए जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि कीमतों पर दबाव पहले से ही दिखाई दे रहा था. कमजोर होता रुपया आने वाले महीनों में आयातित सामानों को और भी महंगा बना सकता है. उन्होंने कहा, ‘ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की अपील मूल रूप से एक चेतावनी भरा संदेश है, जिसमें लोगों से संसाधनों और आयातित उत्पादों का अधिक समझदारी से उपयोग करने का आग्रह किया गया है.’
अर्थशास्त्रियों के विचार
जाने-माने अर्थशास्त्री और जेएनयू के रिटायर्ड प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि सरकार को यह अपील बहुत पहले ही कर देनी चाहिए थी, क्योंकि आर्थिक स्थिति पहले ही काफी चुनौतीपूर्ण हो चुकी है. हाल के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पिछले एक महीने में भारत की कच्चे तेल की खरीद में कमी आई है, जिससे पता चलता है कि देश अब तक अपने मौजूदा भंडार पर ही निर्भर रहा है.
उनके अनुसार इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले महीनों में ईंधन भंडार पर दबाव पड़ सकता है, और एक बार जब भारत को ऊंची कीमतों पर कच्चा तेल आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, तो इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है. उन्होंने चेतावनी दी कि महंगे तेल आयात से महंगाई का दबाव बढ़ेगा और कई क्षेत्रों में लागत में वृद्धि होगी.
कुमार ने सरकार को यह भी सलाह दी कि अगर पेट्रोल की कीमतें बढ़ाई भी जाती हैं, तो भी डीजल की कीमतें बढ़ाने से बचा जाए. उन्होंने कहा कि डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर कहीं ज़्यादा व्यापक होगा, क्योंकि कृषि, परिवहन और माल ढुलाई में डीजल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है.
उन्होंने कहा कि डीजल की लागत में किसी भी बढ़ोतरी का असर आखिरकार जरूरी चीजों की कीमतों पर पड़ेगा और आम नागरिकों पर एक अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. प्रधानमंत्री की अपील पर टिप्पणी करते हुए, भारत के पहले मुख्य सांख्यिकीविद और अर्थशास्त्री प्रणब सेन ने ईटीवी भारत से कहा कि पीएम मोदी द्वारा सुझाए गए उपाय मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा बचाने के उद्देश्य से हैं.
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार किसी गंभीर दबाव में नहीं है. उन्होंने कहा कि संयम बरतने के लिए सरकार का यह प्रयास एक एहतियाती कदम है, खासकर इसलिए क्योंकि अगर आने वाले महीनों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनी रहती हैं और उनमें कोई नरमी नहीं आती, तो आखिरकार देश के भंडार पर दबाव पड़ सकता है.
साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्थिति अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची है, जहां खपत पर किसी तरह की पाबंदी या रोक लगाना जरूरी हो. उन्होंने यह भी आगाह किया कि निकट भविष्य में सबसे बड़ी चिंता उर्वरक (खाद) हो सकते हैं, क्योंकि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति से जुड़ा दबाव पहले से ही बढ़ रहा है. सेन ने आगे कहा कि अगर पश्चिम एशिया का संकट और गहराता है, तो भारत को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक हासिल करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, जिसका असर कृषि क्षेत्र पर भी पड़ सकता है.
उद्योग की राय
ईटीवी भारत ने इंडिया एसएमई फोरम के अध्यक्ष विनोद कुमार से बात की, जिन्होंने कहा कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ईंधन की अस्थिर कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों के इस दौर में जिम्मेदार आर्थिक व्यवहार और सामूहिक अनुशासन बेहद जरूरी है.
उन्होंने कहा कि जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव भी जैसे अनावश्यक यात्रा कम करना, बिजली बचाना, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना, डिजिटल बैठकों को बढ़ावा देना और ईंधन की खपत में कटौती करना मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर एक सार्थक प्रभाव डाल सकते हैं.
कुमार ने देश भर के एसएमई से यह भी आग्रह किया कि जहां संभव हो, वे हाइब्रिड कार्य पद्धतियों को अपनाएं, अनावश्यक ऊर्जा के उपयोग को कम करें, लॉजिस्टिक्स की दक्षता में सुधार करें, स्थानीय स्रोतों से खरीदारी का समर्थन करें और अपने कर्मचारियों व समुदायों के बीच जिम्मेदार उपभोग को प्रोत्साहित करें. उन्होंने कहा कि इंडिया एसएमई फोरम राष्ट्रीय हित में टिकाऊ व्यावसायिक पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग के हितधारकों, सरकारी एजेंसियों और एसएमई के साथ मिलकर काम करने के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है.
पीएम मोदी की 7 जरूरी अपील
पीएम मोदी ने वैश्विक मुश्किल समय में भारत को मजबूत बनाने के लिए 7 जरूरी अपील की है. जहाँ तक हो सके घर से काम करने को प्राथमिकता दें, फ्यूल की खपत कम करें, एक साल तक विदेश यात्रा से बचें, स्वदेशी प्रोडक्ट अपनाएँ, खाना पकाने के तेल का इस्तेमाल कम करें, नेचुरल खेती की ओर बढ़ें और गैर-जरूरी सोने की खरीदारी कम करें. जिम्मेदारी की सामूहिक भावना भारत को और मजबूत और आत्मनिर्भर बना सकती है.


