धनबाद:हर साल प्रसव के दौरान और डिलीवरी के बाद होने वाली जटिलताओं के कारण हजारों महिलाओं की जान चली जाती है. इनमें सबसे बड़ा कारण है पोस्टपार्टम हेमरेज यानी प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव है. यदि समय पर सही इलाज और प्रशिक्षित डॉक्टरों की मदद मिल जाए तो माताओं की जान बचाई जा सकती है. इसी उद्देश्य से धनबाद सोसायटी ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी के स्वर्ण जयंती पर वार्षिक सम्मेलन का आयोजन किया गया. जिसमें देशभर के विशेषज्ञ डॉक्टर एक मंच पर जुटे हैं और सुरक्षित मातृत्व को लेकर नई तकनीकों और उपचार पद्धतियों पर चर्चा की.
करीब 300 विशेषज्ञ सम्मेलन में हुईं शामिल
धनबाद में आयोजित दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन महिला स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया है. सम्मेलन में दिल्ली, नोएडा, अहमदाबाद, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, झारखंड और बिहार की कई प्रख्यात स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया है. करीब 300 डॉक्टरों की मौजूदगी में सुरक्षित मातृत्व, हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी, मातृ मृत्यु दर में कमी, बांझपन और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की जा रही है.
सबसे महत्वपूर्ण पीपीएच वर्कशॉप
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण पीपीएच वर्कशॉप है. पोस्टपार्टम हेमरेज यानी डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है. इस गंभीर स्थिति में कुछ ही मिनटों में महिला की हालत बिगड़ सकती है. इसलिए विशेषज्ञ डॉक्टर चिकित्सकों को यह प्रशिक्षण दे रहे हैं कि ऐसी स्थिति में किस तरह त्वरित निर्णय लेकर मरीज की जान बचाई जा सकती है.
देश की कई प्रख्यात चिकित्सक हुईं शामिल
इस वर्कशॉप में रेवाड़ी से डॉ. मित्रा सक्सेना, दिल्ली से डॉ. मंजू पुरी, बेंगलुरु से डॉ. शिला और नोएडा से डॉ. पूनम गोयल आधुनिक उपचार पद्धतियों की जानकारी दे रही हैं. डॉक्टरों को दवाओं के सही उपयोग, इमरजेंसी प्रबंधन, रक्त की उपलब्धता और आवश्यक सर्जिकल तकनीकों के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना चुनौती
सम्मेलन में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने की चुनौतियों पर भी चर्चा की गई. विशेषज्ञों ने कहा कि कई बार दूर-दराज के इलाकों से मरीज को अस्पताल तक लाने में देरी हो जाती है, जिससे स्थिति गंभीर हो जाती है. यदि हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान पहले से हो जाए और समय रहते मरीज को रेफर कर दिया जाए तो मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है.
पांच अलग-अलग सेशन का आयोजन
डॉक्टरों को पांच समूहों में बांटकर पांच अलग-अलग स्कील सेशन आयोजित किए जा रहे हैं. इनमें पीपीएच प्रबंधन, हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी, बांझपन, प्रसव संबंधी जटिलताएं और कानूनी पहलुओं पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है. विशेषज्ञ यह भी बता रहे हैं कि जटिल मामलों में उचित प्रबंधन और सही दस्तावेजीकरण के माध्यम से चिकित्सक अनावश्यक कानूनी विवादों से कैसे बच सकते हैं.
इन्फर्टिलिटी पर भी विशेष सत्र
बांझपन यानी इन्फर्टिलिटी पर भी विशेष सत्र आयोजित की गई. इसमें उन दंपतियों के लिए नवीनतम उपचार विकल्पों पर चर्चा हो रही है, जिन्हें गर्भधारण में कठिनाई होती है. विशेषज्ञों ने कहा कि समय पर जांच और सही उपचार से कई दंपतियों को मातृत्व-पितृत्व का सुख मिल सकता है.
डॉक्टरों ने गर्भधारण से पहले और गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच की आवश्यकता पर भी जोर दिया. उनका कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉयड, डायबिटीज और एनीमिया जैसी समस्याओं की समय रहते पहचान हो जाए तो गर्भावस्था को काफी हद तक सुरक्षित बनाया जा सकता है.
पोस्टपार्टम हेमरेज महिलाओं की मौत का बड़ा कारण
सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. कोमल सिंह ने कहा कि प्रसव के बाद होने वाला अत्यधिक रक्तस्राव महिलाओं की मौत का बड़ा कारण है. हालांकि इस समस्या को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय पर उपचार, नई दवाओं और प्रशिक्षित मेडिकल टीम की मदद से अधिकांश महिलाओं की जान बचाई जा सकती है. उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन का उद्देश्य चिकित्सकों को नवीनतम तकनीकों से अपडेट करना है, ताकि हर महिला को सुरक्षित मातृत्व का अधिकार मिल सके.

धनबाद में आयोजित यह सम्मेलन सिर्फ डॉक्टरों का अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि मातृ मृत्यु दर घटाने और महिला स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में एक ठोस प्रयास है. विशेषज्ञों का एक ही संदेश है यदि गर्भावस्था की नियमित निगरानी हो, जोखिम की पहचान समय पर की जाए और आपातकालीन स्थिति में तुरंत उपचार मिले, तो हर मां की जान बचाई जा सकती है.


