रांची: झारखंड में जनजातीय बहुल क्षेत्रों के विकास के लिए आवंटित करोड़ों रुपये खर्च नहीं हो पाने का मामला सामने आया है। महालेखाकार (AG) के ऑडिट के अनुसार, राज्य के छह समेकित जनजाति विकास अभिकरणों (ITDA) और गढ़वा जिला कल्याण पदाधिकारी कार्यालय के पास कुल 218.49 करोड़ रुपये की राशि पड़ी हुई है। यह राशि कल्याण विभाग की ओर से विभिन्न विकास योजनाओं को लागू करने के लिए उपलब्ध कराई गई थी।
इस मामले ने जनजातीय क्षेत्रों में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और सरकारी धन के उपयोग को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में राशि खर्च नहीं होने के कारणों और संबंधित योजनाओं की वर्तमान स्थिति का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है।
सात कार्यालयों के पास करोड़ों रुपये की राशि
ऑडिट में जिन छह ITDA और गढ़वा जिला कल्याण पदाधिकारी कार्यालय का उल्लेख किया गया है, उनके पास पड़ी राशि का विवरण इस प्रकार है:
| कार्यालय का नाम | उपलब्ध राशि |
|---|---|
| ITDA, खूंटी | 34.04 करोड़ रुपये |
| ITDA, सरायकेला | 53.71 करोड़ रुपये |
| ITDA, चाईबासा | 10.94 करोड़ रुपये |
| ITDA, साहिबगंज | 33.03 करोड़ रुपये |
| ITDA, रांची | 44.49 करोड़ रुपये |
| ITDA, गुमला | 30.51 करोड़ रुपये |
| जिला कल्याण पदाधिकारी कार्यालय, गढ़वा | 11.76 करोड़ रुपये |
| कुल | 218.48 करोड़ रुपये |
नोट: खबर में कुल राशि 218.49 करोड़ रुपये बताई गई है, जबकि तालिका में दी गई राशियों का जोड़ 218.48 करोड़ रुपये होता है। इस अंतर की आधिकारिक आंकड़ों से पुष्टि आवश्यक है।
क्या है ITDA और इसकी भूमिका?
झारखंड के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में विकास योजनाओं को लागू करने के लिए कुल 15 समेकित जनजाति विकास अभिकरण (ITDA) कार्यरत हैं। इनका उद्देश्य जनजातीय समुदायों तक सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने में सहायता करना है।
पहले इन क्षेत्रों में योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए MESO परियोजना कार्यालय काम करते थे। खबर के मुताबिक, वर्ष 2009 में व्यवस्था में बदलाव करते हुए इन्हें ITDA में परिवर्तित किया गया। इन संस्थाओं का पंजीकरण सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत किया गया है।
विकास योजनाओं के खर्च पर उठे सवाल
कल्याण विभाग ITDA को जनजातीय क्षेत्रों में विकास योजनाओं के संचालन के लिए धन उपलब्ध कराता है। ऐसे में खातों में बड़ी राशि पड़ी रहने की ऑडिट रिपोर्ट से यह सवाल उठता है कि आवंटित धन का उपयोग योजनाओं के लिए निर्धारित समय पर क्यों नहीं हो पाया।
हालांकि, सिर्फ खाते में राशि मौजूद होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरी राशि का उपयोग नहीं हुआ या किसी तरह की अनियमितता हुई है। इसके लिए संबंधित कार्यालयों के खर्च के विवरण, योजनाओं की प्रगति, राशि के आवंटन की शर्तों और ऑडिट की विस्तृत टिप्पणियों को देखना जरूरी है।
अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि संबंधित कार्यालयों में राशि खर्च नहीं होने के क्या कारण हैं और जनजातीय क्षेत्रों की विकास योजनाओं पर इसका कितना प्रभाव पड़ा है।
