Saturday, October 31, 2026

कौन थीं विठाबाई नारायणगांवकर? लावणी और तमाशा की दुनिया में ऐसे बनीं ‘तमाशा सम्राज्ञी’

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मनोरंजन डेस्क | 31 अक्टूबर 2026 | Bharat Superfast News

महाराष्ट्र की लोककला और सांस्कृतिक विरासत में विठाबाई नारायणगांवकर का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। लावणी और तमाशा की दुनिया में अपनी असाधारण प्रस्तुतियों के दम पर उन्होंने अलग पहचान बनाई। उन्हें ‘तमाशा सम्राज्ञी’ के नाम से भी जाना गया। अब फिल्म निर्माता लक्ष्मण उतेकर उनकी जिंदगी को बड़े पर्दे पर ला रहे हैं। उनकी आगामी फिल्म ‘ईठा’ में अभिनेत्री श्रद्धा कपूर विठाबाई का किरदार निभाती नजर आएंगी। फिल्म की रिलीज तारीख 4 दिसंबर 2026 बताई गई है।

विठाबाई की जिंदगी केवल मंच की सफलता की कहानी नहीं थी। इसमें पारिवारिक संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयां और निजी जीवन की कई मुश्किलें भी शामिल थीं। आइए जानते हैं उनके जीवन और कला के सफर के बारे में।

कौन थीं विठाबाई नारायणगांवकर?

विठाबाई भाऊ मांग नारायणगांवकर मराठी लोकनृत्य, गायन और तमाशा की जानी-मानी कलाकार थीं। उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनका जन्म 1 जुलाई 1935 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ था।

उनका परिवार पीढ़ियों से तमाशा मंडली से जुड़ा था। उनके दादा नारायण खुडे ने पारंपरिक घूमती हुई लोक तमाशा मंडली शुरू की थी। बाद में उनके पिता और चाचा ने इसे ‘भाऊ-बापू मांग’ के नाम से आगे बढ़ाया।

बचपन से ही विठाबाई का माहौल लावणी, गवलन और दूसरी पारंपरिक लोककलाओं से जुड़ा रहा। उन्होंने कम उम्र में ही इन कलाओं को सीखना शुरू कर दिया था।

आर्थिक तंगी के बीच शुरू किया मंच पर काम

परिवार की आर्थिक स्थिति कठिन होने के कारण विठाबाई ने कम उम्र में ही परिवार की मदद करने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने मंच पर प्रस्तुतियां देना शुरू किया।

उनके नृत्य, गायन और भावपूर्ण अभिनय ने दर्शकों का ध्यान खींचा। धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी और महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में लोग उनकी प्रस्तुतियां देखने पहुंचने लगे।

उनकी प्रस्तुतियों में लावणी के साथ संगीत, अभिनय और कहानी कहने की कला का अनूठा मेल देखने को मिलता था।

निजी जीवन में भी झेलनी पड़ीं कई कठिनाइयां

विठाबाई की जिंदगी में निजी संघर्ष भी कम नहीं थे। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि करीब 15 वर्ष की उम्र में उन्हें यौन हिंसा का सामना करना पड़ा था। इस घटना का उल्लेख उनकी जिंदगी से जुड़े संघर्षों के संदर्भ में किया जाता है।

बाद में उन्होंने मारुति सावंत से विवाह किया। उनके वैवाहिक जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने अपनी कला और मंचीय प्रस्तुतियों का सिलसिला जारी रखा।

गर्भावस्था के अंतिम दिनों तक करती रहीं प्रस्तुति

विठाबाई के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग अक्सर चर्चा में आता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने गर्भावस्था के अंतिम दिनों में भी मंच पर प्रस्तुति दी थी। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उन्होंने मंच के पीछे बच्चे को जन्म देने के बाद फिर से प्रस्तुति जारी रखी।

हालांकि, इस घटना से जुड़े विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। उनके जीवन की यह कहानी उस दौर में लोक कलाकारों को पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन के बीच आने वाली कठिनाइयों की ओर भी ध्यान दिलाती है।

कैसे मिली ‘तमाशा सम्राज्ञी’ की पहचान?

महाराष्ट्र का तमाशा लोकनाट्य संगीत, नृत्य, हास्य, व्यंग्य और अभिनय का मिश्रित पारंपरिक कला रूप है। इसमें कलाकार को केवल नृत्य ही नहीं, बल्कि गायन, संवाद और दर्शकों से जुड़ने की कला में भी दक्ष होना पड़ता है।

विठाबाई इन सभी विधाओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करती थीं। उनकी लावणी प्रस्तुतियों में प्रभावशाली भाव-भंगिमाएं, लय और मंच पर मजबूत उपस्थिति देखने को मिलती थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रसिद्ध मराठी नाटककार मामा वरेरकर भी उनकी प्रस्तुति से प्रभावित हुए थे। उन्होंने विठाबाई को अपने समूह से जुड़ने का आमंत्रण दिया। इससे उन्हें लोक तमाशा के पारंपरिक मंच से आगे अपनी कला को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर मिला।

समय के साथ उनकी प्रसिद्धि बढ़ी और उन्हें ‘तमाशा सम्राज्ञी’ यानी तमाशा की महारानी के रूप में पहचान मिली।

मिले कई सम्मान और पुरस्कार

विठाबाई को उनके कला योगदान के लिए कई सम्मान मिलने की जानकारी मिलती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्हें 1957 और 1990 में राष्ट्रपति स्तर के सम्मान से नवाजा गया था।

यह भी बताया जाता है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्होंने उत्तर-पूर्वी सीमांत क्षेत्र के पास तैनात भारतीय सैनिकों के लिए प्रस्तुति दी थी।

वर्ष 2006 में महाराष्ट्र सरकार ने उनकी स्मृति में ‘विठाबाई नारायणगांवकर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ शुरू किया। यह सम्मान तमाशा और लोककला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कलाकारों को दिया जाता है।

आर्थिक मुश्किलों के बीच हुआ जीवन का अंत

विठाबाई नारायणगांवकर का निधन 15 जनवरी 2002 को महाराष्ट्र के नारायणगांव में हुआ था। उस समय उनकी उम्र 66 वर्ष बताई गई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, उनकी मृत्यु लकवे के दौरे के बाद हुई।

उनके जीवन से जुड़ी रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख मिलता है कि अंतिम समय में परिवार को अस्पताल के खर्च और पार्थिव शरीर को घर ले जाने के लिए आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

एक ओर विठाबाई ने लोककला के मंच पर बड़ी पहचान बनाई, वहीं दूसरी ओर उनका जीवन इस बात की ओर भी ध्यान खींचता है कि कई पारंपरिक कलाकारों को प्रसिद्धि मिलने के बावजूद आर्थिक सुरक्षा की कमी से जूझना पड़ता है।

‘ईठा’ में श्रद्धा कपूर निभाएंगी विठाबाई का किरदार

फिल्म निर्माता लक्ष्मण उतेकर की फिल्म ‘ईठा’ के जरिए विठाबाई नारायणगांवकर की जिंदगी और उनके कला-सफर को बड़े पर्दे पर दिखाने की तैयारी है। फिल्म में श्रद्धा कपूर मुख्य भूमिका निभा रही हैं।

फिल्म से दर्शकों को महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककला, तमाशा और लावणी की दुनिया के साथ एक ऐसी कलाकार के जीवन को जानने का अवसर मिलेगा, जिसने तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी कला के जरिए अलग पहचान बनाई।

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