क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) शुरुआती चरणों में बिना स्पष्ट लक्षणों के बढ़ सकती है। किडनी का काम केवल खून से अपशिष्ट पदार्थों को छानना नहीं है, बल्कि यह ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने, शरीर में पानी और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखने, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करने और हड्डियों को स्वस्थ रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने पर शरीर के कई अंगों पर इसका असर दिखाई दे सकता है।
हैदराबाद के यशोदा हॉस्पिटल्स में सीनियर कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट और ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. तरुण कुमार साहा के अनुसार, CKD शरीर के अलग-अलग सिस्टम को प्रभावित कर सकती है। कई मामलों में शुरुआती दौर में बीमारी का पता नहीं चलता और इसकी पहचान जांच के दौरान या जटिलताएं सामने आने पर होती है।
1. दिल की सेहत पर पड़ सकता है असर
क्रोनिक किडनी डिजीज और हृदय संबंधी समस्याओं के बीच गहरा संबंध है। किडनी की कार्यक्षमता कम होने पर शरीर में अतिरिक्त पानी और सोडियम जमा हो सकते हैं। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल पर दबाव पड़ सकता है।
इसके अलावा, CKD से जुड़ा एनीमिया और रक्त वाहिकाओं में होने वाले बदलाव भी हृदय की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे मरीजों में हार्ट फेलियर, हार्ट अटैक, दिल की धड़कन अनियमित होने और स्ट्रोक जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
यह संबंध दोनों तरफ से काम करता है। हृदय की बीमारी के कारण किडनी तक रक्त पहुंचने में परेशानी हो सकती है, जिससे उसकी कार्यक्षमता और प्रभावित हो सकती है।
2. हाई ब्लड प्रेशर और शरीर में सूजन
किडनी शरीर में नमक और पानी की मात्रा को नियंत्रित करने में मदद करती है। जब इसकी कार्यक्षमता कम होती है, तो शरीर में अतिरिक्त तरल जमा होने लगता है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और पैरों, टखनों तथा हाथों में सूजन दिखाई दे सकती है।
कुछ लोगों को आंखों के आसपास सूजन या कम समय में वजन बढ़ने की समस्या भी हो सकती है। यदि अतिरिक्त तरल फेफड़ों में जमा होने लगे, तो सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
हाई ब्लड प्रेशर किडनी को और नुकसान पहुंचा सकता है। इस तरह दोनों समस्याएं एक-दूसरे को गंभीर बना सकती हैं।
3. एनीमिया के कारण थकान और कमजोरी
स्वस्थ किडनी एरिथ्रोपोइटिन नामक हार्मोन बनाती है, जो शरीर को लाल रक्त कोशिकाएं बनाने का संकेत देता है। CKD के दौरान इस हार्मोन का उत्पादन कम हो सकता है। इसके साथ ही आयरन की कमी जैसे कारण भी एनीमिया का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
एनीमिया होने पर शरीर के ऊतकों तक पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता प्रभावित होती है। इसके कारण थकान, कमजोरी, चक्कर आना, त्वचा का पीला पड़ना और एकाग्रता में परेशानी हो सकती है।
लगातार थकान को केवल काम का दबाव या नींद की कमी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें किडनी की बीमारी और एनीमिया भी शामिल हैं।
4. हड्डियां कमजोर होने का खतरा
किडनी कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन D के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। CKD बढ़ने पर इन मिनरल्स का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे हड्डियों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
कुछ मरीजों में फॉस्फोरस का स्तर बढ़ सकता है और विटामिन D के सक्रिय रूप का निर्माण कम हो सकता है। इससे पैराथाइरॉइड हार्मोन का स्तर भी प्रभावित होता है, जो हड्डियों में कैल्शियम के संतुलन को नियंत्रित करने में मदद करता है।
इन बदलावों के कारण हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन और फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ सकता है। शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस का असंतुलन रक्त वाहिकाओं को भी प्रभावित कर सकता है।
5. पोटैशियम बढ़ने और एसिड जमा होने की समस्या
किडनी खून में पोटैशियम का स्तर संतुलित रखने में मदद करती है। CKD में पोटैशियम शरीर से पर्याप्त मात्रा में बाहर नहीं निकल पाता, जिससे इसका स्तर बढ़ सकता है। इस स्थिति को हाइपरकेलेमिया कहा जाता है।
खून में पोटैशियम की मात्रा बहुत अधिक होने पर दिल की धड़कन खतरनाक रूप से अनियमित हो सकती है। कई बार इसके शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते, इसलिए डॉक्टर की सलाह पर खून की जांच कराना महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा, किडनी शरीर से अतिरिक्त एसिड बाहर निकालने में भी मदद करती है। इसकी कार्यक्षमता कम होने पर शरीर में एसिड जमा हो सकता है। इससे हड्डियों और मांसपेशियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है और बीमारी की जटिलताएं बढ़ सकती हैं।
6. दिमाग, नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर असर
CKD का प्रभाव केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता। कुछ मरीजों को नींद में परेशानी, याददाश्त में बदलाव या ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई हो सकती है। बीमारी के साथ लंबे समय तक जीने का तनाव भी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को भी गंभीरता से लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से बात करना और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना उपयोगी हो सकता है।
7. संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है
क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीजों में प्रतिरक्षा प्रणाली की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। इससे कुछ संक्रमणों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना, डॉक्टर की सलाह के अनुसार टीकाकरण कराना और संक्रमण के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना महत्वपूर्ण है।
CKD की पहचान के लिए कौन-सी जांच जरूरी है?
क्रोनिक किडनी डिजीज के शुरुआती चरणों में स्पष्ट लक्षण नहीं दिख सकते। इसलिए जोखिम वाले लोगों में समय पर जांच कराना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
डॉक्टर जरूरत के अनुसार इन जांचों की सलाह दे सकते हैं:
- ब्लड क्रिएटिनिन और eGFR: किडनी की कार्यक्षमता का आकलन करने के लिए।
- यूरिन एल्ब्यूमिन या ACR: पेशाब में एल्ब्यूमिन की मात्रा जांचने के लिए।
- ब्लड प्रेशर की जांच: उच्च रक्तचाप की पहचान और निगरानी के लिए।
- अन्य रक्त जांच: जरूरत के अनुसार पोटैशियम, कैल्शियम, फॉस्फोरस और हीमोग्लोबिन का स्तर जानने के लिए।
डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या किडनी की बीमारी का पारिवारिक इतिहास होने पर डॉक्टर से जांच की आवश्यकता के बारे में सलाह लेनी चाहिए।
कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
पैरों या चेहरे पर लगातार सूजन, पेशाब में बदलाव, असामान्य थकान या ब्लड प्रेशर बढ़ने जैसे लक्षणों पर चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। सांस लेने में अचानक या गंभीर परेशानी होने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लें।
ध्यान रखें: CKD की पहचान केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जा सकती। सही निदान के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन और आवश्यक जांच जरूरी हैं। समय पर बीमारी की पहचान और उचित उपचार से इसकी प्रगति तथा संबंधित जटिलताओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है, किसी व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह या निदान का विकल्प नहीं है।
