रांची | 30 अक्टूबर 2026
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने कशिश डेवलपर्स की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने केंद्रीय कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) की ओर से शुरू कराई गई गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की जांच रद्द करने की मांग की थी। न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय की अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद याचिका खारिज की।
कंपनी ने दलील दी थी कि दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा आर्थिक अपराध शाखा में दर्ज प्राथमिकी निरस्त किए जाने के बाद MCA की ओर से जांच जारी रखने का आधार नहीं रह जाता। हालांकि, झारखंड हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
DHFL से लिए गए कर्ज और फंड के इस्तेमाल पर सवाल
मामले के अनुसार, कशिश डेवलपर्स ने वर्ष 2013 में गुरुग्राम में ग्रुप हाउसिंग परियोजना शुरू की थी। वर्ष 2015 तक परियोजना पर काम चल रहा था, लेकिन बाद में फंड की कमी की समस्या सामने आई।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2018 में परियोजना को दोबारा शुरू करने के लिए दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (DHFL) से 725 करोड़ रुपये का कर्ज स्वीकृत कराया गया था। इसमें से कंपनी को 503 करोड़ रुपये मिलने की बात कही गई है। बाद में DHFL दिवालिया हो गया।
अदालत के फैसले के संबंध में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज स्वीकृत कराने के दौरान गलत विवरण दिए जाने और धन के कथित तौर पर इधर-उधर किए जाने के पहलुओं को महत्वपूर्ण माना गया।
घर खरीदारों की शिकायत से शुरू हुआ मामला
परियोजना से जुड़े दो घर खरीदारों ने कथित तौर पर अपनी रकम वापस मांगते हुए आर्थिक अपराध शाखा में शिकायत की थी। रिपोर्ट के अनुसार, गुरुग्राम की आर्थिक अपराध शाखा ने जांच के बाद शिकायतों को तथ्यहीन बताया था। इसके बाद शिकायतकर्ताओं ने दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा में प्राथमिकी दर्ज कराई।
बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने उस प्राथमिकी को निरस्त कर दिया। इसके बावजूद MCA ने कंपनी के खिलाफ गंभीर वित्तीय अपराधों से संबंधित जांच शुरू कराई। कशिश डेवलपर्स ने इसी जांच को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया था।
जांच रोकने की मांग अदालत ने नहीं मानी
झारखंड हाईकोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले से MCA की ओर से शुरू की गई जांच को रोकने की मांग स्वीकार नहीं हुई है।
मामले में लगे वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों और जांच के निष्कर्षों के बीच अंतर करना जरूरी है। याचिका खारिज होने का अर्थ अपने आप में कंपनी के खिलाफ सभी आरोपों का अंतिम रूप से साबित होना नहीं है।
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