Friday, May 29, 2026

ऑटोइम्यून किडनी की बीमारियां (जैसे ल्यूपस नेफ्राइटिस, IGA नेफ्रोपैथी, और वैस्कुलाइटिस) तब होती हैं जब इम्यून सिस्टम हेल्दी किडनी टिशू पर हमला करता है…

Share

ऑटोइम्यून किडनी डिजीज तब होती है जब शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से किडनी पर हमला करता है. मतलब, इम्यून सिस्टम अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं को बाहरी खतरा मानकर उन पर हमला कर देता है. इसके कारण किडनी के ग्लोमेरुलाइ में सूजन आ जाती है और वे अपना सामान्य काम (खून को साफ करना) ठीक से नहीं कर पाते हैं. अगर जल्दी पता न चले और इलाज न किया जाए, तो ये कंडीशन क्रोनिक किडनी डिजीज या किडनी फेलियर का रूप ले सकती हैं.

ऑटोइम्यून किडनी रोग क्या है?
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक, ऑटोइम्यून किडनी की बीमारी में, असामान्य इम्यून रिस्पॉन्स किडनी के टिशू को नुकसान पहुंचाते हैं, विशेष रूप से उन फिल्टरिंग इकाइयों को जिन्हें ‘ग्लोमेरुली’ कहा जाता है. इसके परिणामस्वरूप फिल्टरेशन कम हो जाता है, प्रोटीन यूरिन के साथ बाहर निकलने लगता है, और खून में वेस्ट प्रोडक्ट्स का लेवल बढ़ने लगता है. ये बीमारियां किसी भी उम्र या जेंडर के लोगों को हो सकती हैं, हालांकि जेनेटिक वजहों और एनवायरनमेंटल फैक्टर्स की वजह से किसी को ये होने की संभावना ज्यादा हो सकती है.

ऑटोइम्यून किडनी डिजीज के आम प्रकार में शामिल है…

  • ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस
  • ल्यूपस नेफ्राइटिस
  • IgA नेफ्रोपैथी
  • वैस्कुलाइटिस-संबंधी किडनी डिजीज
  • हर कंडीशन के लिए खास डायग्नोस्टिक टेस्ट और टारगेटेड ट्रीटमेंट की जरूरत होती है.

ऑटोइम्यून किडनी डिजीज के संकेत और लक्षण
ऑटोइम्यून किडनी डिजीज के लक्षणों को पहचानना इस बात का फैसला कर सकता है कि इलाज आसानी से हो जाएगा या इसके लिए डायलिसिस की जरूरत पड़ेगी. शुरुआती लक्षण हल्के लगते हैं और अक्सर लोग इन्हें सेहत से जुड़ी कोई छोटी-मोटी बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिसमें शामिल है.

यूरिन में बदलाव: शुरुआती संकेत अक्सर आपके पेशाब में दिखाई देते हैं. प्रोटीन्यूरिया का मतलब है कि आपके पेशाब में बहुत ज्यादा प्रोटीन आ रहा है, जिससे फ्लश करने के बाद भी पेशाब में झाग बना रहता है. पेशाब में खून आना, जिसे हीमेट्यूरिया कहते हैं, आपके पेशाब का रंग गुलाबी, लाल या कोला जैसा भी हो सकता है. ये दिक्कतें तब होती हैं जब किडनी के फिल्टर (नेफ्रॉन या ग्लोमेरुली) डैमेज हो जाते हैं, तो वे प्रोटीन (जैसे एल्ब्यूमिन) और लाल रक्त कोशिकाओं को खून में रोकने के बजाय पेशाब में रिसने देते हैं.

सूजन और पानी जमा होना: बिना किसी वजह के आपकी आंखों, टखनों या पैरों के पास सूजन यह बताती है कि आपकी किडनी फ्लूइड को बैलेंस नहीं रख पा रही है. यह सूजन सुबह सबसे ज्यादा होती है और ज्यादा फ्लूइड जमा होने से तेजी से वजन बढ़ सकता है.

सिस्टमिक लक्षण इस प्रकार है…लगातार थकान जिसे नींद भी ठीक नहीं कर पातीलगातार हाई ब्लड प्रेशर और भूख न लगना अक्सर ऑटोइम्यून किडनी की दिक्कतों में दिखते हैं. अगर किडनी की समस्या किसी बड़े ऑटोइम्यून डिसऑर्डर से जुड़ी है, तो बहुत से लोगों को जोड़ों में दर्द, स्किन पर दाने या बार-बार इन्फेक्शन होने लगते हैं.

गंभीर चेतावनी के संकेत: जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है, लक्षण और साफ होते जाते हैं. बीमार महसूस करना, उल्टी आना, ध्यान लगाने में परेशानी होना, या बार-बार पेशाब जाने की जरूरत या पेशाब में बदलाव किडनी की समस्या के बिगड़ने का संकेत है. इन लक्षणों के दिखाई देते ही आपको तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

ऑटोइम्यून किडनी डिजीज के कारण होने वाले कॉम्प्लीकेशंस
ऑटोइम्यून किडनी के कॉम्प्लीकेशंस क्रोनिक किडनी डिजीज शरीर के लगभग हर हिस्से पर असर डाल सकती है. कॉम्प्लीकेशंस में ये शामिल हो सकते हैं..

  • हाई ब्लड प्रेशर- किडनी का मुख्य काम खून को फिल्टर करना और बेकार नमक और पानी को यूरिन के जरिए बाहर निकालना है. जब किडनी ठीक से काम नहीं करती है, तो शरीर में नमक और पानी जमा हो जाता है. इससे नसों में ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. हाई ब्लड प्रेशर किडनी की बारीक नसों को सख्त और कमजोर कर देता है. इससे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम हो जाती है. किडनी जितनी खराब होगी, BP उतना ही ज्यादा होगा और BP जितना ज्यादा होगा, किडनी को उतना ही ज्यादा नुकसान होगा.
  • एसिड बिल्डअप- इसे एसिडोसिस भी कहते हैं, एसिड बिल्डअप तब होता है जब किडनी शरीर के एसिड को बाहर निकालने में असमर्थ होती है या शरीर बहुत अधिक एसिड बनाता है, तो यह स्थिति पैदा होती है.
  • फ्लूइड रिटेंशन- इससे पैरों में सूजन, हाई ब्लड प्रेशर या फेफड़ों में फ्लूइड जमा हो सकता है, जिसे पल्मोनरी एडिमा भी कहते हैं, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है. फ्लूइड रिटेंशन आमतौर पर किडनी की बीमारी के बाद के स्टेज में होता है. शरीर का वजन अचानक बढ़ना फ्लूइड रिटेंशन का संकेत हो सकता है.
  • खून में पोटैशियम का लेवल अधिक होना- इसे हाइपरकलेमिया भी कहते हैं, यह स्थिति अचानक हो सकती है. यह आमतौर पर किडनी की बीमारी के बाद के स्टेज में होता है और दिल को नुकसान पहुंचा सकता है और जानलेवा हो सकता है.
  • एनीमिया- जब शरीर के टिशू तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, तो थकान, कमजोरी और त्वचा में पीलापन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. किडनी फेलियर के कारण भी आरबीसी (RBC) का स्तर गिर सकता है.
  • दिल की बीमारी- किडनी की गंभीर बीमारी होने पर, आर्टरीज नाम की ब्लड वेसल सख्त हो सकती हैं और बंद हो सकती हैं. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और दिल की बीमारी हो सकती है.
  • कमजोर हड्डियां- कमजोर हड्डियों और हड्डियों के फ्रैक्चर का ज्यादा खतरा हो सकता है.
  • सेक्सुअल हेल्थ से जुड़ी चिंताएं- सेक्स ड्राइव में कमी, इरेक्टाइल डिस्फंक्शन या फर्टिलिटी में कमी हो सकती है.
  • सेंट्रल नर्वस सिस्टम को नुकसान- इससे ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है या पर्सनैलिटी में बदलाव आ सकते हैं. यह कॉम्प्लिकेशन आमतौर पर किडनी की बीमारी के आखिरी स्टेज में होती है.
  • इम्यून सिस्टम में बदलाव- आपका इम्यून रिस्पॉन्स कम हो सकता है, जिससे आपको इन्फेक्शन का खतरा हो सकता है.
  • पेरिकार्डिटिस- दिल को ढकने वाली थैली जैसी मेम्ब्रेन की यह सूजन किडनी की गंभीर बीमारी वाले लोगों में हो सकती है.
  • प्रेग्नेंसी की कॉम्प्लिकेशन- मां और पेट में पल रहे बच्चे को खतरा हो सकता है.
  • किडनी को लंबे समय तक नुकसान- जिंदा रहने के लिए डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है

Read more

Local News