Sunday, November 1, 2026

बिहार विधान परिषद में BJP की मुश्किल बढ़ी? राहुल राज और बंशीधर बृजवासी की सदस्यता पर दल-बदल कानून की चर्चा

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पटना | 1 नवंबर 2026 | Bharat Superfast News

बिहार विधान परिषद के हालिया चुनाव के बाद दो नवनिर्वाचित निर्दलीय सदस्यों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़ने को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जीते बंशीधर बृजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित डॉ. राहुल राज की कथित पार्टी सदस्यता को लेकर विपक्ष ने दल-बदल कानून का मुद्दा उठाया है।

विवाद उस समय बढ़ा, जब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने पहले दोनों नेताओं के पार्टी में शामिल होने की जानकारी दी और बाद में अपने बयान में कहा कि उन्होंने भाजपा को समर्थन दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इस मामले में विधान परिषद के सभापति से दोनों सदस्यों की अयोग्यता की मांग करने की बात कही है।

चुनाव में दोनों नेताओं ने जदयू उम्मीदवारों को हराया था

विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए चुनाव में बंशीधर बृजवासी और डॉ. राहुल राज निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे।

  • बंशीधर बृजवासी ने तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू के अभिषेक झा को 9,147 मतों से हराया।
  • डॉ. राहुल राज ने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू के आनंद पुष्कर को 1,815 मतों से पराजित किया।

दोनों नेताओं की जीत के बाद भाजपा से उनके जुड़ने की खबर सामने आई, जिसके बाद सदस्यता और दल-बदल कानून को लेकर विवाद शुरू हो गया।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के पहले बयान से बढ़ा विवाद

खबर के मुताबिक, शनिवार को भाजपा विधानमंडल दल की बैठक के दौरान दोनों नेताओं को पार्टी की सक्रिय सदस्यता दिलाई गई। प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने उन्हें 200 रुपये की सदस्यता रसीद भी दी और सोशल मीडिया पर दोनों के भाजपा में शामिल होने की जानकारी साझा की।

हालांकि, इस पोस्ट के करीब दो घंटे बाद प्रदेश अध्यक्ष की ओर से दूसरा संदेश जारी किया गया। इसमें कहा गया कि बंशीधर बृजवासी और राहुल राज ने भाजपा को समर्थन दिया है। दूसरे संदेश में उनके पार्टी में शामिल होने की बात नहीं दोहराई गई।

इस बदलाव के बाद यह सवाल उठने लगा कि दोनों नेताओं ने केवल भाजपा को बाहर से समर्थन दिया है या औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता भी ग्रहण की है।

निर्दलीय सदस्य के पार्टी में शामिल होने पर क्या कहता है कानून?

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सदन की सदस्यता से अयोग्यता के प्रावधान दिए गए हैं। इसके पैरा 2(2) के अनुसार, किसी सदन का ऐसा निर्वाचित सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव नहीं जीता है, चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।

इस प्रावधान के तहत निर्दलीय निर्वाचित सदस्य का किसी दल को बाहर से समर्थन देना और औपचारिक रूप से उस दल की सदस्यता ग्रहण करना अलग-अलग स्थितियां हैं। किसी मामले में सदस्य ने वास्तव में पार्टी ज्वाइन की है या केवल समर्थन दिया है, इसका निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों और सदस्य के आचरण के आधार पर किया जाता है।

दसवीं अनुसूची के पैरा 6(1) के मुताबिक, दल-बदल के आधार पर अयोग्यता से जुड़े सवाल पर संबंधित सदन के सभापति फैसला करते हैं। इसलिए केवल राजनीतिक आरोप या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर सदस्यता समाप्त नहीं मानी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी स्पष्ट किया गया है अंतर

निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों के पार्टी में शामिल होने और बाहर से समर्थन देने के अंतर पर न्यायिक फैसलों में विचार किया गया है। Jagjit Singh मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि निर्दलीय सदस्य का किसी दल को बाहर से समर्थन देना और उस दल में शामिल होना एक जैसी स्थिति नहीं है। यह तय करने के लिए उपलब्ध सामग्री और सदस्य के आचरण की जांच जरूरी है।

इमकोंग इमचेन से जुड़े मामले में भी दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के प्रावधान पर विचार हुआ था। ऐसे मामलों में सदस्यता संबंधी औपचारिकताओं के साथ वास्तविक परिस्थितियों को भी देखा जा सकता है।

RJD ने सभापति से अयोग्यता की मांग करने की बात कही

इस विवाद पर RJD सांसद मनोज झा ने पटना में संवाददाता सम्मेलन कर भाजपा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत निर्दलीय निर्वाचित सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण नहीं कर सकता।

मनोज झा ने कहा कि उनकी पार्टी इस मामले को विधान परिषद के सभापति के सामने उठाएगी और दोनों सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की मांग करेगी। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।

भाजपा ने कहा- दोनों नेताओं ने पार्टी को समर्थन दिया है

विवाद बढ़ने के बाद भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि बंशीधर बृजवासी और राहुल राज ने भाजपा को समर्थन देने का फैसला किया है। उनके मुताबिक, विधानमंडल दल की बैठक में दोनों नेताओं ने पार्टी को समर्थन देने की बात कही थी।

इस बयान के बाद पार्टी की ओर से दोनों नेताओं के औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल होने के दावे से दूरी बनाई गई।

दोनों नेताओं के पुराने बयान भी चर्चा में

खबर के अनुसार, विवाद से पहले बंशीधर बृजवासी ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि निर्दलीय चुनाव जीतने के बावजूद उन्हें लगा कि शिक्षकों के हितों की आवाज उठाने के लिए उन्हें राजनीतिक दल का साथ चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिले आश्वासन का उल्लेख करते हुए भाजपा की सदस्यता लेने की बात कही थी।

वहीं, राहुल राज ने कहा था कि उनका जुड़ाव पहले से भाजपा की विचारधारा से रहा है। उन्होंने यह भी कहा था कि टिकट नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने भाजपा से अपना संबंध बनाए रखा और पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।

इन बयानों और सदस्यता रसीदों को लेकर अब राजनीतिक विवाद और कानूनी सवाल दोनों उठ रहे हैं।

जन सुराज नेता और अधिवक्ता ने भी उठाए सवाल

जन सुराज से जुड़े नेता और उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अमित कुमार ने भी इस घटनाक्रम पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यदि दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों ने चुनाव जीतने के बाद भाजपा की औपचारिक सदस्यता ली है, तो यह दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत जांच का विषय बन सकता है।

उन्होंने कहा कि इस संबंध में विधान परिषद के सभापति के समक्ष शिकायत की जाएगी। उनके मुताबिक, सभापति के फैसले के बाद संबंधित पक्ष न्यायिक विकल्प भी अपना सकते हैं।

अब सभापति के फैसले पर टिकी नजर

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि बंशीधर बृजवासी और राहुल राज ने भाजपा की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की है या केवल पार्टी को समर्थन दिया है। सदस्यता रसीद, प्रदेश अध्यक्ष का पहला और बाद का संदेश तथा दोनों नेताओं के सार्वजनिक बयान इस विवाद में महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।

हालांकि, दोनों सदस्यों की अयोग्यता को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। अब संभावित शिकायत, उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर सभापति की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।

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