Thursday, November 5, 2026

बिहार में कृत्रिम पनीर के निर्माण और बिक्री पर पटना हाईकोर्ट सख्त, सरकार से छह सप्ताह में मांगा जवाब.

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Patna News, 5 November 2026: बिहार में कृत्रिम पनीर (एनालॉग पनीर) के कथित अवैध निर्माण और बिक्री के मामले पर पटना हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 11 जनवरी 2027 को निर्धारित की गई है।

खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की मांग

राजीव रंजन सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका में दावा किया गया है कि बिहार में बड़े पैमाने पर कृत्रिम पनीर का निर्माण और बिक्री हो रही है। याचिका में इसे आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बताते हुए खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 को प्रभावी ढंग से लागू कराने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी आग्रह किया है कि लोगों को एनालॉग पनीर और सामान्य पनीर के बीच अंतर समझाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाए। इसके साथ ही कृत्रिम और मिलावटी पनीर के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में भी आम नागरिकों को जानकारी देने की मांग की गई है।

अधिकारियों को आवेदन देने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने का आरोप

याचिकाकर्ता के अनुसार, इस समस्या को लेकर राज्य के मुख्य सचिव और स्वास्थ्य सचिव को पहले भी अभ्यावेदन दिया गया था। हालांकि, उनका आरोप है कि इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई।

याचिका में यह भी कहा गया है कि खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से मिठाई दुकानों और रेस्टोरेंट में समय-समय पर छापेमारी की जाती है और संदिग्ध पनीर पकड़े जाने के मामले भी सामने आते हैं। इसके बावजूद नियमित निगरानी और प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को छह सप्ताह में जवाब दाखिल करने का समय दिया है। वहीं, याचिकाकर्ता को सरकार के जवाब पर प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।

11 जनवरी 2027 को अगली सुनवाई

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 जनवरी 2027 की तारीख तय की है। अब राज्य सरकार के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि कृत्रिम पनीर के निर्माण और बिक्री पर नियंत्रण के लिए संबंधित विभागों की ओर से क्या कदम उठाए गए हैं और आगे क्या कार्रवाई प्रस्तावित है।

16 साल पुराने स्टांप शुल्क विवाद में सरकार के रुख की सराहना

इसी बीच पटना हाईकोर्ट में एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के रुख की सराहना की गई। यह मामला रंजू देवी की याचिका से जुड़ा था, जिसमें जमीन के स्टांप शुल्क निर्धारण को लेकर विवाद चल रहा था।

न्यायमूर्ति राज कुमार की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि तकनीकी आपत्तियों के आधार पर मामले को लंबा खींचने के बजाय सरकार ने अपनी गलती सुधारते हुए सही बाजार मूल्य (एमवीआर) के आधार पर शुल्क तय करने की पहल की।

मामला पटना जिले के मरांची गांव की ताल श्रेणी की जमीन से संबंधित था। आरोप के अनुसार, अधिकारियों ने गलत गणना के आधार पर वर्ष 2016 में अतिरिक्त स्टांप शुल्क और जुर्माना लगाने का आदेश जारी किया था।

सरकार की ओर से सातवें पूरक जवाब में सही दर स्वीकार किए जाने के बाद हाईकोर्ट ने पुराने मांग आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्धारित 8,652 रुपये का स्टांप शुल्क चार सप्ताह के भीतर जमा करने और इसके अगले चार सप्ताह में निबंधित दस्तावेज सौंपने का निर्देश दिया।

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