नई दिल्ली: निजी अस्पतालों में इलाज के बढ़ते खर्च के बीच मरीजों को राहत देने के लिए संसदीय समिति ने कई अहम सुझाव दिए हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि महानगरों में निजी अस्पतालों के सामान्य कमरों का बेसिक किराया आसपास के 3-स्टार होटलों के औसत कमरे के किराए से अधिक नहीं होना चाहिए।
समिति ने यह सुझाव स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों की पहुंच में रखने और अस्पतालों में इलाज के दौरान होने वाले अत्यधिक खर्च को नियंत्रित करने के उद्देश्य से दिया है। यह सिफारिश समिति की स्वास्थ्य सुविधाओं की सामर्थ्य और उपलब्धता से संबंधित रिपोर्ट का हिस्सा है।
सिर्फ बेसिक रूम टैरिफ पर लागू होगी सीमा
समिति के प्रस्ताव के अनुसार, किराए की सीमा अस्पताल के सामान्य कमरे के मूल टैरिफ पर लागू होगी। हालांकि, डॉक्टर की फीस, नर्सिंग शुल्क, दवाइयां, मेडिकल कंज्यूमेबल्स, भोजन और लॉन्ड्री जैसी सेवाओं के लिए अलग शुल्क लिया जा सकेगा।
पहले चरण में इस व्यवस्था को दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों के निजी अस्पतालों में लागू करने पर विशेष जोर दिया गया है।
सरकारी और निजी अस्पतालों के खर्च में बड़ा अंतर
समिति ने नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी और निजी अस्पतालों में भर्ती होने के खर्च में काफी अंतर है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी अस्पताल में भर्ती का औसत खर्च करीब ₹6,631 है, जबकि निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा लगभग ₹50,508 तक पहुंच जाता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि मेडिकल खर्च में हर साल करीब 10 से 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी जा रही है। कुछ बड़े निजी अस्पतालों में कमरे का दैनिक किराया ₹7,000 से ₹11,500 तक बताया गया है। वहीं, संबंधित इलाकों के 3-स्टार होटलों में औसत कमरे का किराया करीब ₹2,100 से ₹3,500 के बीच होने का उल्लेख किया गया है।
सर्जरी और इलाज के पैकेज की कीमतें सार्वजनिक करने का सुझाव
समिति ने अस्पतालों में इलाज की लागत को पारदर्शी बनाने के लिए सर्जरी और अन्य निर्धारित उपचारों के लिए मानकीकृत पैकेज तैयार करने की भी सिफारिश की है।
इसके तहत अस्पतालों को तय प्रक्रियाओं की कीमतें पहले से सार्वजनिक करने और मरीजों को संभावित खर्च की स्पष्ट जानकारी देने की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है।
छिपे हुए शुल्क पर भी लगाम की जरूरत
समिति का मानना है कि इलाज के पैकेज में डॉक्टर की फीस, जरूरी जांच, दवाइयां और ऑपरेशन के बाद की देखभाल जैसे खर्चों की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए। इससे मरीजों और उनके परिजनों को इलाज शुरू होने से पहले संभावित कुल खर्च का अंदाजा मिल सकेगा और अचानक सामने आने वाले अतिरिक्त बिलों की समस्या कम हो सकती है।
अभी सिफारिश, लागू होना बाकी
फिलहाल ये प्रस्ताव संसदीय समिति की सिफारिशें हैं, कोई लागू नियम नहीं। इन्हें अमल में लाने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी, संबंधित मंत्रालय के दिशा-निर्देश और आवश्यक नियामकीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
यदि इन सुझावों पर आगे कार्रवाई होती है, तो निजी अस्पतालों में रूम रेंट और इलाज के कुल खर्च को लेकर मरीजों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कम करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
