Ranchi News | 3 नवंबर 2026: झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं विकास को लेकर मंगलवार को राजधानी रांची में जनजातीय-क्षेत्रीय भाषा मार्च निकाला गया। इसमें आदिवासी समाज, झारखंडी समुदाय, विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों, स्नातकोत्तर विद्यार्थियों और भाषाविदों ने भाग लिया। मार्च के जरिए राज्य की पांच जनजातीय और चार क्षेत्रीय भाषाओं सहित कुल नौ मान्यता प्राप्त भाषाओं को बचाने और उनके विकास के लिए ठोस सरकारी पहल की मांग उठाई गई।
पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए लोग
मार्च में शामिल लोग पारंपरिक आदिवासी परिधानों में नजर आए। उनके हाथों में भाषा संरक्षण से जुड़े संदेश लिखी तख्तियां थीं। प्रतिभागियों ने कहा कि झारखंड की भाषाएं यहां की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और परंपराओं का आधार हैं। इन्हें बचाने के लिए केवल सरकारी घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि प्रभावी योजनाओं की जरूरत है।
पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने भी मार्च में शामिल होकर भाषाओं के संरक्षण का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान यहां की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ी है। राज्य गठन के आंदोलन में भी इन भाषाओं की अहम भूमिका रही है। इसके बावजूद इनके विकास के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं हो रहे हैं।
उन्होंने भाषा संरक्षण के लिए ठोस नीति बनाने और पर्याप्त बजटीय प्रावधान करने की जरूरत बताई।
विश्वविद्यालयों में पढ़ाई और शिक्षकों की नियुक्ति की मांग
मार्च में शामिल विद्यार्थियों और भाषाविदों ने चिंता जताई कि विश्वविद्यालयों में कई जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई पर्याप्त स्तर पर नहीं हो रही है। इसका असर नई पीढ़ी पर पड़ रहा है और युवा धीरे-धीरे अपनी मातृभाषाओं से दूर होते जा रहे हैं।
आंदोलनकारियों ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं के शिक्षकों तथा व्याख्याताओं के नए पद सृजित करने की मांग की। साथ ही खाली पदों पर नियमित नियुक्ति की बात भी उठाई गई। उनका कहना था कि शिक्षकों की कमी के कारण कई भाषाओं का पठन-पाठन प्रभावित हो रहा है।
भाषा नीति बनाने में विशेषज्ञों की भागीदारी हो
प्रदर्शनकारियों ने राज्य सरकार की भाषा नीतियों पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि हाल में लागू क्लस्टर आधारित भाषा नीति तैयार करते समय स्थानीय भाषाविदों और विशेषज्ञों से पर्याप्त परामर्श नहीं लिया गया।
उन्होंने मांग की कि भविष्य में भाषा से जुड़ी नीतियां बनाने से पहले संबंधित भाषा समुदायों, शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की राय ली जाए। आंदोलनकारियों के अनुसार, भाषा संरक्षण की योजनाएं तभी प्रभावी होंगी, जब उनमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
भाषा के साथ सांस्कृतिक विरासत बचाने पर भी जोर
मार्च में वक्ताओं ने कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। इसलिए भाषाओं के संरक्षण के साथ उनसे संबंधित पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक प्रतीकों को भी बचाना जरूरी है।
इस दौरान कुड़ुख के डंडा काटा, मुंडा समुदाय के ससनदिरी, खोरठा के घोड़ा नाच और नागपुरी की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार की मांग उठाई गई।
प्रदर्शनकारियों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें प्रशासनिक कार्यों और आम लोगों से संवाद में स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।
अल्बर्ट एक्का चौक से बिरसा मुंडा समाधि स्थल तक निकला मार्च
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा मार्च अल्बर्ट एक्का चौक से शुरू हुआ और भगवान बिरसा मुंडा के समाधि स्थल तक पहुंचा। वहां सभा आयोजित कर कार्यक्रम का समापन किया गया।
आंदोलनकारियों ने बताया कि पिछले छह महीनों के दौरान दीक्षांत मंडप में आयोजित भाषा सम्मेलन, जनजातीय अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) में संवाद और विशेषज्ञों के साथ हुई बैठकों के आधार पर एक विस्तृत सुझाव पत्र तैयार किया गया है। इसे जल्द ही मुख्यमंत्री को सौंपने की योजना है।
शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की मांग
मार्च में शामिल लोगों ने स्पष्ट किया कि झारखंडी भाषाओं को बचाने के लिए सरकार, शिक्षाविदों, भाषाविदों और संबंधित समुदायों को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने भाषाओं को शिक्षा और रोजगार के अवसरों से जोड़ने, शिक्षकों की नियुक्ति करने तथा संरक्षण योजनाओं के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराने की मांग की।
आंदोलनकारियों का कहना है कि मातृभाषाओं का संरक्षण केवल सांस्कृतिक विषय नहीं, बल्कि झारखंड की ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान को सुरक्षित रखने का सवाल भी है।
Bharat Superfast News | Ranchi Desk
