नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) को आधिकारिक कार्यों के संबंध में मिलने वाली कानूनी छूट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दी है। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। यह याचिका एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से दायर की गई है।
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने और इसके कारण बंद हुई कुछ कानूनी कार्यवाहियों को दोबारा शुरू करने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने आया। पीठ ने याचिका पर विचार करने की सहमति देते हुए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।
याचिका में उठाए गए सवालों का अंतिम निर्णय सुनवाई और संबंधित पक्षों की दलीलों के आधार पर होगा। अदालत की ओर से जवाब मांगा जाना अपने आप में यह नहीं दर्शाता कि याचिका में लगाए गए आरोपों या कानूनी तर्कों को स्वीकार कर लिया गया है।
क्या कहती है मुख्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 16?
साल 2023 के कानून की धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कुछ कार्यों के संबंध में कानूनी संरक्षण प्रदान करती है।
ADR ने इसी प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए हैं। याचिका में मांग की गई है कि धारा 16 को असंवैधानिक, अमान्य और प्रभावहीन घोषित किया जाए।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के साथ-साथ संविधान के मूल ढांचे के अनुरूप नहीं है। इन तर्कों पर अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है।
ADR ने कानूनी संरक्षण को लेकर क्या दलील दी?
ADR की याचिका में दावा किया गया है कि धारा 16 वर्तमान और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों तथा चुनाव आयुक्तों को व्यापक कानूनी सुरक्षा देती है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इस तरह का संरक्षण चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उचित रूप से जुड़ा हुआ नहीं है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि संबंधित प्रावधान चुनाव आयुक्तों के खिलाफ कुछ कानूनी कार्यवाहियों को रोकने का प्रभाव पैदा करता है और इससे न्यायिक समीक्षा तथा जवाबदेही से जुड़े सवाल उठते हैं।
ADR ने मांग की है कि धारा 16 के लागू होने के कारण बंद हुई संबंधित कानूनी कार्यवाहियों को दोबारा शुरू करने पर भी विचार किया जाए।
ध्यान रहे कि ये याचिकाकर्ता के तर्क हैं। धारा 16 की संवैधानिक वैधता और इसके कानूनी प्रभाव पर अंतिम निर्णय अदालत को करना है।
लोक प्रहरी की याचिका के साथ जोड़ा जाएगा मामला
चुनाव आयुक्तों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका गैर-सरकारी संगठन लोक प्रहरी की ओर से भी दायर की गई है। यह मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत की पीठ ने ADR की नई याचिका को लोक प्रहरी की याचिका के साथ जोड़ने का निर्देश दिया है। इससे दोनों मामलों में कानूनी संरक्षण से जुड़े समान सवालों पर एक साथ विचार किया जा सकेगा।
आगे क्या होगा?
अब केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को याचिका में उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष रखना होगा। सुनवाई के दौरान अदालत यह विचार करेगी कि धारा 16 संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं।
इस मामले का फैसला चुनाव आयुक्तों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण, उनकी जवाबदेही और आधिकारिक कार्यों से संबंधित कानूनी कार्यवाहियों के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी।
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