Saturday, September 19, 2026

कम प्रोटीन से लंबी उम्र का कनेक्शन? नई रिसर्च में सेल्स की ‘रिपेयर प्रक्रिया’ पर फोकस.

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नई दिल्ली: प्रोटीन शरीर के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है, लेकिन क्या ज्यादा प्रोटीन लेना हमेशा बेहतर होता है? हालिया वैज्ञानिक शोधों में प्रोटीन की मात्रा, अमीनो एसिड और स्वस्थ उम्र बढ़ने के बीच संबंध पर नए सिरे से चर्चा हुई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को कम प्रोटीन खाना शुरू कर देना चाहिए।

प्रोटीन कम होने पर शरीर में क्या होता है?

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, भोजन से मिलने वाले प्रोटीन या कुछ विशेष अमीनो एसिड की उपलब्धता घटने पर शरीर में ऐसे जैविक संकेत सक्रिय हो सकते हैं, जो कोशिकाओं को वृद्धि के बजाय संरक्षण और मरम्मत से जुड़ी प्रक्रियाओं की ओर ले जाते हैं।

इन प्रक्रियाओं में ऑटोफैगी (Autophagy) भी शामिल है। आसान भाषा में समझें तो यह कोशिकाओं की एक प्राकृतिक सफाई व्यवस्था है, जिसमें पुराने या क्षतिग्रस्त सेलुलर हिस्सों को हटाकर उन्हें रिसाइकिल करने में मदद मिलती है।

हालांकि, ऐसे निष्कर्षों को सीधे यह मान लेना सही नहीं होगा कि कम प्रोटीन खाने से इंसानों की उम्र निश्चित रूप से बढ़ जाती है। इंसानों में पोषण और दीर्घायु का संबंध कई कारकों पर निर्भर करता है।

हर व्यक्ति की प्रोटीन जरूरत अलग होती है

प्रोटीन की सही मात्रा उम्र, शरीर की संरचना, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार बदल सकती है। सामान्य तौर पर कम सक्रिय वयस्कों के लिए करीब 0.8 से 1 ग्राम प्रति किलोग्राम शरीर के वजन के आसपास प्रोटीन पर्याप्त हो सकता है।

वहीं, नियमित रूप से भारी व्यायाम या वेट ट्रेनिंग करने वाले लोगों की जरूरत अधिक हो सकती है। ऐसे मामलों में करीब 1.2 से 2 ग्राम प्रति किलोग्राम तक की मात्रा का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में किया जाता है।

इसलिए केवल ज्यादा प्रोटीन लेना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए। पर्याप्त और संतुलित मात्रा ज्यादा महत्वपूर्ण है।

मोटापा और डायबिटीज में क्या भूमिका हो सकती है?

मोटापे या डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए डाइट में प्रोटीन की मात्रा व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार तय करना जरूरी है। कुछ मामलों में पर्याप्त प्रोटीन पेट भरा हुआ महसूस कराने और वजन कम करते समय मांसपेशियों को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

कुछ विशेषज्ञ ऐसे लोगों के लिए एडजस्टेड बॉडी वेट के आधार पर लगभग 1.0 से 1.5 ग्राम प्रति किलोग्राम प्रतिदिन की मात्रा पर विचार करते हैं। हालांकि, यह कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डाइट में बदलाव जरूरी हो सकता है।

हाई-प्रोटीन डाइट में इन बातों का रखें ध्यान

अगर प्रोटीन बढ़ाने के चक्कर में फल, सब्जियां, फाइबर और साबुत अनाज जैसे खाद्य पदार्थ कम हो जाएं, तो डाइट का संतुलन बिगड़ सकता है। इसी तरह अत्यधिक प्रोसेस्ड मीट पर निर्भर रहने वाली डाइट भी स्वास्थ्य के लिहाज से उचित नहीं मानी जाती।

किडनी से जुड़ी बीमारी या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या होने पर प्रोटीन की मात्रा खुद से बढ़ाना या घटाना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन से सलाह लेना बेहतर है।

‘ज्यादा’ या ‘कम’ नहीं, सही मात्रा है जरूरी

प्रोटीन को लेकर मौजूदा बहस का सबसे अहम संदेश यही है कि हर व्यक्ति के लिए एक जैसी मात्रा सही नहीं हो सकती। समान वजन वाले दो लोगों की मांसपेशियों की मात्रा, गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति अलग हो सकती है, इसलिए उनकी पोषण संबंधी जरूरत भी अलग होगी।

वैज्ञानिक शोध शरीर में प्रोटीन और सेलुलर रिपेयर के बीच दिलचस्प संबंध जरूर दिखाते हैं, लेकिन इन्हें वजन घटाने या उम्र बढ़ाने के लिए खुद से कम प्रोटीन लेने की सलाह के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। संतुलित आहार और व्यक्ति की वास्तविक जरूरत के मुताबिक पोषण लेना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी तरह की डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य पोषण विशेषज्ञ की सलाह लें।

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