ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का कमजोर होना) मुख्य रूप से महिलाओं को प्रभावित करता है, खासकर मेनोपॉज के बाद. इसका मुख्य कारण महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में अचानक गिरावट आना है, जो हड्डियों की मजबूती बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी होता है. हालांकि, यह मान लेना गलत होगा कि यह समस्या सिर्फ महिलाओं को ही होती है, उम्र बढ़ने के साथ पुरुष भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं. हाल के वर्षों में, लो बोन डेंसिटी और ऑस्टियोपोरोसिस के कारण कम उम्र के पुरुषों में भी फ्रैक्चर के मामले बढ़ रहे हैं. सर एच.एन. रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल में ऑर्थोपेडिक्स डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. वैभव बागड़िया का इस मुद्दे पर क्या कहना है, जानिए…
डॉ. वैभव बागड़िया का कहना है कि पहले, ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या को सिर्फ महिलाओं और बुजुर्गों तक ही सीमित माना जाता था. लेकिन खराब लाइफस्टाइल, अनहेल्दी डाइट और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण, जवान पुरुषों में भी लो बोन डेंसिटी और फ्रैक्चर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. यह एक गंभीर समस्या है क्योंकि पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस का अक्सर पता नहीं चल पाता, जिससे समय पर इलाज नहीं हो पाता. विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि ऑस्टियोपोरोसिस के कारण होने वाले फ्रैक्चर से गंभीर विकलांगता हो सकती है. दुनिया भर में, 50 साल से ज्यादा उम्र के लगभग हर सात में से एक पुरुष को अपने जीवनकाल में कभी न कभी ऑस्टियोपोरोसिस से जुड़ा फ्रैक्चर होने की संभावना होती है.

कम उम्र के पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस के शुरुआती लक्षण
डॉ. वैभव बागड़िया का कहना है कि चिंता की बात यह है कि ऑस्टियोपोरोसिस का पता शुरुआती स्टेज में बहुत कम ही चल पाता है, इसलिए, इसे अक्सर ‘साइलेंट डिजीज’ कहा जाता है. कई लोगों को इसके बारे में तब पता चलता है जब मामूली गिरने या चोट लगने के बाद हड्डी टूट जाती है. कम उम्र के पुरुषों में, शुरुआती लक्षणों में लगातार पीठ दर्द, बार-बार स्ट्रेस फ्रैक्चर, कमजोर पकड़ या झुककर चलने की आदत, मामूली चोट से कलाई, रीढ़ या कूल्हे की हड्डी का आसानी से टूटना, शरीर की बनावट या पोस्चर में साफ बदलाव, या चोट के बाद ठीक होने में ज्यादा समय लगना शामिल हो सकता है.
कम उम्र के पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस के कारण
डॉ. वैभव बागड़िया बताते हैं कि उम्र के अलावा, पुरुषों में इसके मुख्य कारणों में टेस्टोस्टेरोन का कम लेवल, विटामिन D की कमी या कैल्शियम का ठीक से न पचना शामिल हो सकता है. जीवनशैली और मेडिकल से जुड़े कई कारण भी इस ट्रेंड में भूमिका निभा सकते हैं. कई आदतें आपकी हड्डियों को कमजोर कर सकती हैं, उदाहरण के लिए, एक सुस्त जीवनशैली जैसे कि ज्यादातर समय बैठे रहना, स्क्रीन देखते रहना और बहुत कम धूप में निकलना जैसे फैक्टर्स हड्डियों की सेहत के लिए नुकसानदायक है. अन्य कारणों में प्रोटीन का कम सेवन, कैल्शियम और विटामिन D की कमी, धूम्रपान, शराब का ज्यादा सेवन, फैड डाइटिंग और जंक फूड से भरपूर डाइट शामिल हैं.
ये फैक्टर्स सभी आपकी हड्डियों की सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं और ऑस्टियोपोरोसिस की स्थिति को और खराब कर सकते हैं जो युवा नियमित रूप से वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज नहीं करते, वे हड्डियों का जरूरी पीक मास बनाने या बनाए रखने में नाकाम हो सकते हैं. ऑस्टियोपोरोसिस की पुष्टि अक्सर एक्सरे या अल्ट्रासाउंड से नहीं, बल्कि डेक्सा स्कैन (DEXA Scan) के जरिये बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) मापकर की जाता है.

सेकेंडरी ऑस्टियोपोरोसिस
डॉ. वैभव बागड़िया बताते हैं कि एक और जरूरी समस्या है सेकेंडरी ऑस्टियोपोरोसिस. युवाओं और कम उम्र के पुरुषों में होने वाले ऑस्टियोपोरोसिस के पीछे अक्सर सेकेंडरी ऑस्टियोपोरोसिस ही जिम्मेदार होता है. सेकेंडरी ऑस्टियोपोरोसिस मुख्य रूप से किसी अंदरूनी बीमारी या दवा के साइड इफेक्ट की वजह से होता है. इसके कारणों में विटामिन D की कमी, थायरॉइड की समस्या, टेस्टोस्टेरोन का कम लेवल, लंबे समय तक स्टेरॉयड का इस्तेमाल, पोषक तत्वों के ठीक से न पचने की समस्या, किडनी की बीमारी, इन्फ्लेमेटरी आर्थराइटिस, डायबिटीज या कुछ खास दवाएं शामिल हैं. चूंकि ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित आधे से ज्यादा पुरुषों में इसका कारण सेकेंडरी हो सकता है, इसलिए सही जांच और मूल्यांकन बहुत जरूरी है. पुरुषों में हड्डियों के कमजोर होने को सिर्फ सामान्य फिटनेस की कमी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर मामूली चोट या गिरने से हड्डी टूट जाए, बार-बार स्ट्रेस इंजरी हो, या बिना किसी साफ वजह के पीठ में दर्द हो, तो हड्डियों की सेहत की जांच करवानी चाहिए. मकसद सिर्फ फ्रैक्चर का इलाज करना नहीं, बल्कि हड्डी टूटने की असल वजह का पता लगाना भी है.
इससे कैसे बचें
डॉ. वैभव बागड़िया के अनुसार बचाव की शुरुआत जल्दी ही कर देनी चाहिए. इसके लिए युवाओं को रेगुलर रेजिस्टेंस ट्रेनिंग, पैदल चलने या स्पोर्ट्स पर ध्यान देना चाहिए, साथ ही पर्याप्त धूप लेनी चाहिए, कैल्शियम और प्रोटीन से भरपूर चीजें खानी चाहिए, विटामिन D की कमी को ठीक करना चाहिए, स्मोकिंग से बचना चाहिए और शराब का सेवन कम करना चाहिए. जिन लोगों में इसके रिस्क फैक्टर्स हैं, उन्हें ब्लड टेस्ट और जरूरत पड़ने पर DEXA बोन डेंसिटी स्कैन करवाना चाहिए.


