Tuesday, April 7, 2026

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने भारत के राष्ट्रपति द्वारा आर्टिकल 143 के तहत दिए गए रेफरेंस पर अपनी राय दी.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 20 नवंबर को कहा कि गवर्नर और प्रेसिडेंट को किसी भी बिल के लिए मंजूरी देने की कोई टाइमलाइन तय नहीं की जा सकती और गवर्नर भी राज्य विधानसभाओं द्वारा पास किए गए बिलों को अनिश्चित काल तक नहीं रोक सकते. पांच जजों, जिसमें जस्टिस बीआर गवई ,जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर ने मामले की सुनवाई की.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने भारत के राष्ट्रपति द्वारा आर्टिकल 143 के तहत दिए गए रेफरेंस पर अपनी राय देते हुए कहा कि गवर्नर के पास आर्टिकल 200 के तहत तीन संवैधानिक ऑप्शन हैं. इनमें बिल को मंजूरी देना, बिल को प्रेसिडेंट के विचार के लिए रिजर्व रखना या मंजूरी न देना और कमेंट्स के साथ बिल को लेजिस्लेचर को वापस करना शामिल हैं.

प्रेसिडेंशियल रेफरेंस क्या है?
प्रेसिडेंशियल रेफरेंस भारतीय संविधान के आर्टिकल 143 के तहत एक संवैधानिक तरीका है, जिसमें भारत के राष्ट्रपति कानून या तथ्य के जरूरी सवालों पर सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगते हैं. यह पावर एग्जीक्यूटिव को बिना कोई केस शुरू किए मुश्किल संवैधानिक मामलों पर कानूनी जानकारी लेने में मदद करती है.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आर्टिकल 143 का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट से यह राय मांगी कि क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल को कानूनी तौर पर मजबूर किया जा सकता है. रेफरेंस में गवर्नर या राष्ट्रपति द्वारा बिलों पर मंजूरी न देने के लिए टाइमलाइन तय करने और सही वजह बताने पर कोर्ट की राय मांगी गई थी.

क्या है आर्टिकल 143?
आर्टिकल 143 राष्ट्रपति को संवैधानिक या कानूनी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट से कानूनी सलाह लेने का अधिकार देता है. यह सार्वजनिक महत्व के कानूनी या तथ्यात्मक मामलों के रेफरेंस की इजाजत देता है, जिनका जवाब कोर्ट चुन सकता है.

यह राष्ट्रपति को संविधान-पूर्व संधियों, समझौतों, सनदों आदि से विवादों को संदर्भित करने की अनुमति देता है. यह प्रावधान भारत सरकार अधिनियम, 1935 से उत्पन्न हुआ है, जिसने गवर्नर-जनरल को संघीय न्यायालय को कानूनी मामलों को संदर्भित करने का अधिकार दिया.

केस टाइमलाइन
2023 तमिलनाडु सरकार ने राज्य सरकार द्वारा पास किए गए 10 बिलों को मंजूरी देने में गवर्नर आरएन रवि के लंबे समय तक पेंडिंग रहने को चुनौती दी. वहीं , 13 मई 2025 को प्रेसिडेंट द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के आर्टिकल 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट के एडवाइजरी जूरिस्डिक्शन का इस्तेमाल किया. यह प्रोविजन प्रेसिडेंट को कानून या फैक्ट से जुड़े उन सवालों पर कोर्ट की राय लेने का अधिकार देता है जो पब्लिक इंपॉर्टेंस से संबंधित होते हैं. प्रेसिडेंट ने आर्टिकल 200 और 201 के तहत गवर्नर और प्रेसिडेंट की शक्तियों से जुड़े कुल 14 सवालों का जिक्र किया.

8 अप्रैल 2025 सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के लेजिस्लेटिव बिलों को रोकने में गवर्नर की अनिश्चित देरी को गैर-कानूनी और गलत बताया. बेंच ने साफ किया कि संविधान के आर्टिकल 200 के तहत गवर्नर की शक्तियां तीन ऑप्शन तक सीमित थीं. बिलों को मंजूरी देने के लिए गवर्नर के लिए तीन टाइमलाइन तय की गई थीं. अगर बिल काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स की मदद और सलाह से रोके गए थे या प्रेसिडेंट के लिए रिजर्व किए गए थे, तो उन्हें एक महीने के अंदर लेजिस्लेचर को वापस भेजना था.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने रिजर्व किए गए बिलों पर प्रेसिडेंट की किसी भी कार्रवाई को अमान्य घोषित कर दिया. इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आईं, कुछ लोगों ने फैसले की तारीफ की, तो कुछ ने पावर्स ऑफ सेपरेशन को तोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की.

राष्ट्रपति मुर्मू ने चीफ जस्टिस को लेटर लिखकर पूछा कि क्या न्यायिक दखल संवैधानिक है, क्योंकि आर्टिकल 200 और 201 में गवर्नर और प्रेसिडेंट की शक्तियों के इस्तेमाल का कोई टाइमलाइन और तरीका तय नहीं है.

22 जुलाई 2025 को चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली कॉन्स्टिट्यूशन बेंच ने 22 जुलाई 2025 को रेफरेंस पर सुनवाई की. इसके बाद 11 सितंबर 2025 को पांच जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच ने आर्टिकल 200 और 201 के तहत गवर्नर और प्रेसिडेंट की मंजूरी देने की शक्तियों से जुड़े प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर फैसला सुरक्षित रख लिया

किन राज्यों ने किया समर्थन?
केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और पंजाब ने रेफरेंस का विरोध किया और कहा कि राज्य विधानसभाओं द्वारा पास किए गए बिलों पर राज्यपाल अपनी मर्जी का फैसला नहीं कर सकते.मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उड़ीसा, गोवा, छत्तीसगढ़ ने रेफरेंस का समर्थन किया और कहा कि खास हालात में संवैधानिक कामों की सुरक्षा के लिए राज्यपाल की मर्जी का फैसला सुरक्षित रहना चाहिए.

प्रेसिडेंशियल रेफरेंस केस की सुनवाई के आखिरी दिन, केंद्र की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से यह घोषित करने की रिक्वेस्ट की कि तमिलनाडु की दो जजों की बेंच का फैसला सही कानून नहीं बताता है.

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