नई दिल्ली: भारत सरकार देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विदेशों से आयात होने वाले ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाने की तैयारी कर रही है. केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण सचिव संजीव चोपड़ा ने हाल ही में संकेत दिया है कि सरकार अब एथेनॉल को खाना पकाने वाली गैस (LPG) के विकल्प के रूप में तलाश रही है.
शुरुआती चरण में शोध और मॉडल
नई दिल्ली में आयोजित ‘AIDA एनुअल डिस्टिलर्स कॉन्क्लेव 2025’ के दौरान संजीव चोपड़ा ने बताया कि एथेनॉल आधारित कुकिंग स्टोव के शुरुआती यानी ‘रुडिमेंट्री’ मॉडल प्रदर्शित किए गए हैं. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह योजना अभी अपने शुरुआती (नेसेंट) चरण में है. सरकार वर्तमान में इसके तकनीकी पहलुओं, सुरक्षा मानकों और उपलब्धता सुनिश्चित करने पर काम कर रही है.
LPG की बढ़ती कीमतों और सप्लाई की चुनौती
एथेनॉल को विकल्प के रूप में चुनने के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव है. पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी संघर्षों के कारण ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ के माध्यम से होने वाली एलपीजी की सप्लाई प्रभावित हुई है. इसके चलते देश के जमीनी स्तर पर गैस की कमी महसूस की जा रही है और कीमतों में भी भारी उछाल आया है. एथेनॉल एक स्वदेशी विकल्प है, जो ऐसी विदेशी बाधाओं से मुक्त रह सकता है.
सप्लाई चेन और पायलट प्रोजेक्ट
सचिव ने जानकारी दी कि एथेनॉल की सप्लाई चेन को बेहतर बनाने के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं. योजना यह है कि शुरुआत में डिस्टिलरी (एथेनॉल बनाने वाली इकाइयों) के आसपास के क्षेत्रों में इसका परीक्षण किया जाए, जहाँ सप्लाई चेन आसानी से स्थापित की जा सकती है. यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाएगा.
एथेनॉल की बढ़ती मांग और उत्पादन
भारत ने तेल क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार अपनी एथेनॉल उत्पादन क्षमता में काफी सुधार किया है. वर्तमान में 30% ब्लेंडिंग (मिश्रण) का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है. संजीव चोपड़ा के अनुसार, अब चुनौती उत्पादन (सप्लाई) की नहीं बल्कि मांग (डिमांड) पैदा करने की है. सरकार अब एथेनॉल को केवल पेट्रोल में मिलाने तक सीमित न रखकर इसे डीजल के साथ मिलाने, टेक्सटाइल बाय-प्रोडक्ट्स और अब रसोई ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर विचार कर रही है.
चावल की गुणवत्ता और एथेनॉल का संबंध
एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल (फीडस्टॉक) की उपलब्धता पर भी सरकार का विशेष ध्यान है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) के चावल के बजाय ‘टूटे हुए चावल’ (Broken Rice) का उपयोग एथेनॉल बनाने में बढ़ाने की योजना है.
इसके साथ ही, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत दिए जाने वाले चावल की गुणवत्ता सुधारने के लिए 5 राज्यों में एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया है. इसमें मिलों से निकलने वाले चावल में टूटे हुए दानों का प्रतिशत 25% से घटाकर 10% करने का लक्ष्य है. इससे जो अतिरिक्त टूटा हुआ चावल बचेगा, उसे एथेनॉल उद्योग को दिया जा सकेगा, जिससे दोहरे फायदे होंगे—गरीबों को बेहतर चावल मिलेगा और ईंधन के लिए कच्चा माल..


