रांची: स्विट्जरलैंड के जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UN Human Rights Council) के तहत इंडिजिनस समुदायों के अधिकारों पर विशेषज्ञ तंत्र (Expert Mechanism on the Rights of Indigenous Peoples – EMRIP) के 19वें अधिवेशन का शुक्रवार को समापन हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर दुनिया के विभिन्न देशों से करीब 600 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में आदिवासी समुदायों के अधिकार, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था।
- इस अधिवेशन में झारखंड के खूंटी निवासी अनुपम पूर्ति ने मुंडा आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने अपने संबोधन में मुंडा समाज की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए रुमबुल (Rumbul) द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी साझा की।
- प्रस्तुति के दौरान उन्होंने मुंडा भाषा और पारंपरिक गीतों के पुनर्जीवन, वन-आधारित शिक्षण (Forest Walk), भूमि आधारित सीखने की पहल (Land-based Learning) और सुकान बुरू से जुड़े ट्राइबल इमर्शन कार्यक्रम जैसी गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इन पहलों का उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान, भाषा और सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
- इस वैश्विक बैठक का उद्देश्य आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को विशेषज्ञ सलाह उपलब्ध कराना तथा संयुक्त राष्ट्र आदिवासी अधिकार घोषणा (UNDRIP) के प्रभावी क्रियान्वयन में सहयोग देना था।
कौन हैं अनुपम पूर्ति?
अनुपम पूर्ति झारखंड के खूंटी जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रांची के संत एंथोनी स्कूल, डोरंडा से प्राप्त की, जबकि इंटरमीडिएट की पढ़ाई संत जेवियर्स स्कूल, डोरंडा से पूरी की। वे पेशे से ग्राफिक डिजाइनर होने के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी हैं। अनुपम ट्राइबल डिजाइन फोरम के सदस्य और रुमबुल के सह-संस्थापक हैं।
इससे पहले भी वे विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आदिवासी संस्कृति और अपने कार्यों को प्रस्तुत कर चुके हैं। वर्ष 2019 में जर्मनी, 2023 में कंबोडिया, 2024 में न्यूजीलैंड और 2025 में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित वैश्विक कार्यक्रमों में भी उन्होंने झारखंड की आदिवासी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े प्रयासों को साझा किया था।


