Thursday, June 4, 2026

शिल्पी नेहा तिर्की – JTET में भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं को शामिल करना राज्यहित में नहीं है.

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रांची: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा-2026 (JTET) के अंतर्गत राज्य की मूलभूत भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने के उद्देश्य से, कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने भाषा समिति के समक्ष अपने महत्त्वपूर्ण सुझाव और अकादमिक तर्क प्रस्तुत किए. बुधवार को हुई पुनर्गठित भाषा समिति की बैठक के दौरान, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘शिक्षक पात्रता परीक्षा’ (TET) केवल एक सामान्य प्रतियोगी परीक्षा नहीं है; बल्कि, यह एक अनिवार्य योग्यता परीक्षा है, जिसे यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया है कि शिक्षक स्थानीय बच्चों की भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझते हुए उन्हें प्रभावी ढंग से शिक्षित कर सकें. उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद नहीं, बल्कि शिक्षण का आधार भी है.

मंत्री ने क्षेत्रीय भाषाओं पर दिया जोर

कृषि मंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि झारखंड जैसे बहुभाषी राज्य में भाषा केवल बातचीत का जरिया नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपकरण (Pedagogical Tool) है. उन्होंने वर्ष 1981 में तत्कालीन आयुक्त डॉ. कुमार सुरेश सिंह की अनुशंसा और डॉ. रामदयाल मुंडा द्वारा रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना के ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य की 05 जनजातीय भाषाओं (कुड़ुख, मुंडारी, संथाली, खड़िया, हो) और 4 क्षेत्रीय भाषाओं (खोरठा, कुरमाली, नागपुरी, पंचपरगनिया) को शैक्षणिक व्यवस्था का अभिन्न अंग माना जाना चाहिए क्योंकि छात्र इन्हीं भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करते आ रहे हैं.

स्थापित शैक्षणिक सिद्धांत और भाषाई न्याय

दस्तावेजों का हवाला देते हुए शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि ‘जिन भाषाओं के माध्यम से विद्यार्थियों का अध्ययन-अध्यापन होता है, शिक्षण एवं संबंधित सेवाओं की पात्रता परीक्षाओं में भी उन्हीं भाषाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.’ इससे पूरी शिक्षा व्यवस्था स्थानीय आवश्यकताओं, सामाजिक वास्तविकताओं एवं विद्यार्थियों की भाषाई पृष्ठभूमि के अनुरूप अधिक प्रभावी, व्यावहारिक और न्यायसंगत बनती है.

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ‘JTET’ में राज्य की प्रमुख एवं व्यापक रूप से प्रचलित भाषाओं को शामिल करना किसी वर्ग को बाहर करने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों के शैक्षिक हितों की रक्षा हेतु एक आवश्यक व्यवस्था है. इसका एकमात्र और पवित्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विद्यालयों में नियुक्त होने वाला प्रत्येक शिक्षक छोटे बच्चों (विद्यार्थियों) से उनकी परिचित भाषा में न्यूनतम स्तर पर संवाद स्थापित करने में पूर्णतः सक्षम हो.

भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल करना राज्यहित में नहीं

समिति के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत करते हुए शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि झारखंड राज्य का गठन बिहार से अलग होकर विशेष रूप से इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने और स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से किया गया था; पिछले दो दशकों में हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों या प्रवासन को आधार बनाकर पड़ोसी राज्यों की भाषाओं (जैसे भोजपुरी, मगही और अंगिका) को JTET में शामिल करना न्यायसंगत नहीं है. उन्होंने तर्क दिया कि जब इन भाषाओं को स्वयं बिहार लोक सेवा आयोग की सभी भर्तियों में अनिवार्य या आधिकारिक दर्जा प्राप्त नहीं है, तो इन्हें झारखंड के युवाओं पर थोपना और पात्रता का आधार बनाना राज्य के मूल निवासियों के रोजगार अवसरों और स्थानीय हितों के साथ समझौता करना होगा.

वर्ष 2023 के गजट के आधार पर हो भाषा का निर्धारण

शिल्पी नेहा तिर्की ने सरकार और भाषा समिति से माँग की कि JTET के लिए भाषा संबंधी नीति, कार्मिक, प्रशासनिक सुधार और राजभाषा विभाग द्वारा 13 मार्च, 2023 को अधिसूचित राजपत्र (राजपत्र संख्या 147/148) के आधार पर ही की जाए.

कमिटी का पुनर्गठन किया गया था

उन्होंने कहा कि स्पष्ट स्थानीय नीति के अभाव में परीक्षा का पाठ्यक्रम और भाषा ही स्थानीय युवाओं को अवसर देने का एकमात्र माध्यम हैं. अतः राज्य के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और स्थानीय प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए केवल यहां की अधिसूचित क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं को ही परीक्षा में प्राथमिकता दी जाए.
गौरतलब हो कि जेटेट भाषा विवाद को समाप्त करने के लिए मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने पहले पांच मंत्रियों की कमिटी बनाई थी. मंत्री सुदिव्य कुमार द्वारा कमिटी में जनजतीय और अल्पसंख्यक कोटे से सदस्य शामिल नहीं होने का मुद्दा उठाये जाने के बाद शिल्पी नेहा तिर्की और हफीजुल हसन अंसारी को कमिटी में शामिल करते हुए इसे पुनर्गठित किया था.

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