Sunday, March 22, 2026

बॉम्बे हाई कोर्ट ने भाविश अग्रवाल के खिलाफ वारंट पर रोक लगाई.

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ओला इलेक्ट्रिक के संस्थापक और सीईओ भाविश अग्रवाल को कानूनी मोर्चे पर एक बड़ी राहत मिली है. बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने अग्रवाल के खिलाफ दक्षिण गोवा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा जारी किए गए जमानती वारंट और डिटेंशन ऑर्डर पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है. अदालत के इस फैसले से शेयर बाजार में कंपनी के निवेशकों ने थोड़ी राहत की सांस ली है.

क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद प्रीतेश चंद्रकांत घाडी नामक एक ग्राहक की शिकायत से शुरू हुआ था. घाडी ने ओला S1 प्रो (सेकंड जनरेशन) स्कूटर खरीदा था, जिसमें मरम्मत के बाद भी लगातार तकनीकी खामियां आ रही थीं. ग्राहक का आरोप था कि स्कूटर को ठीक करने के बजाय उसे ‘लापता’ कर दिया गया. शिकायतकर्ता ने ₹1.47 लाख के रिफंड और मानसिक उत्पीड़न के लिए ₹50,000 के मुआवजे की मांग की थी. इस मामले में बार-बार नोटिस दिए जाने के बावजूद भाविश अग्रवाल के पेश न होने पर उपभोक्ता आयोग ने उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया था.

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ के तहत आयोग के पास सुनवाई के दौरान किसी पक्ष के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने की शक्ति नहीं है. अदालत ने कहा, “ऐसी शक्ति का उपयोग केवल तब किया जा सकता है जब मुआवजे का आदेश पारित हो चुका हो और उसे सिविल कोर्ट की तरह लागू (Execution) करने की जरूरत हो.” कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि आयोग ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है.

शेयर बाजार की स्थिति
कानूनी राहत की खबर का असर ओला इलेक्ट्रिक के शेयरों पर भी देखने को मिला. बुधवार को प्री-ओपनिंग सत्र में शेयर में करीब 2% की तेजी दर्ज की गई. हालांकि, पिछले कुछ समय से ओला के शेयर भारी दबाव में हैं. आंकड़ों के अनुसार:

पिछले एक महीने में शेयर 24.25% तक टूट चुका है. तीन महीनों में इसमें 34% से अधिक की गिरावट आई है. हाल ही में शेयर ने ₹27.36 का अपना सर्वकालिक निचला स्तर (All-time low) छुआ.

कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ओला ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि वे न्यायपालिका के आभारी हैं जिसने स्पष्ट किया कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया. हालांकि, कानूनी राहत मिलने के बावजूद कंपनी के सामने खराब सर्विस क्वालिटी और गिरती बाजार हिस्सेदारी जैसी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं.

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