Monday, February 9, 2026

बीते 22 वर्षों में राज्य सरकार के विभिन्न विभागों ने 9737.57 करोड़ रुपये के खर्च का हिसाब नहीं दिया है.

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झारखंड में 22 वर्षों के दौरान 9737 करोड़ रुपये के सरकारी खर्च का हिसाब नहीं मिल पाया है. ऑडिट रिपोर्ट में 8000 करोड़ से अधिक के खर्च पर आपत्ति जताई गई है. ऑडिट विभाग ने गबन, गलत मद में खर्च और विभागीय लापरवाही को उजागर किया है. पूरी खबर नीचे पढ़ें.

 झारखंड में सरकारी वित्तीय अनियमितता को लेकर भयावह तस्वीर सामने आई है. बीते 22 वर्षों में राज्य सरकार के विभिन्न विभागों ने 9737.57 करोड़ रुपये के खर्च का हिसाब नहीं दिया है. यह खुलासा राज्य सरकार के अंकेक्षण (ऑडिट) निदेशालय की रिपोर्ट में हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, विकास और अन्य मदों के लिए विभागों को बड़ी राशि दी गई, लेकिन खर्च के प्रमाण, बिल, कैश बुक और उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) तक उपलब्ध नहीं कराए गए.

9737 करोड़ का हिसाब नहीं दे रहे विभाग

ऑडिट विभाग की ओर से वित्तीय वर्ष 2021-22 तक किए गए ऑडिट में सामने आया है कि झारखंड बनने के बाद से अब तक सरकारी विभागों ने हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन उसकी ऑडिट रिपोर्ट पेश नहीं की गई. यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करती है. कई विभागों ने वर्षों से ऑडिट आपत्तियों का न तो जवाब दिया और न ही खर्च को वैध ठहराने वाले दस्तावेज जमा किए. इससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी राशि कहां और कैसे खर्च हुई.

8000 करोड़ से अधिक के खर्च पर ऑडिट आपत्ति

ऑडिट निदेशालय ने इन 22 वर्षों के दौरान करीब 8330 करोड़ रुपये के खर्च पर औपचारिक आपत्ति जताई है. नियम के अनुसार, संबंधित विभागों को इन आपत्तियों का समयबद्ध और संतोषजनक जवाब देना था, लेकिन अधिकांश मामलों में विभागों की ओर से कोई जवाब नहीं आया. ऑडिट रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि विभागीय स्तर पर उदासीनता के कारण आपत्तियां लंबित होती चली गईं और वित्तीय अनुशासन पूरी तरह कमजोर पड़ गया.

63 करोड़ का गबन, 688 करोड़ की वसूली बाकी

ऑडिट के दौरान 63.57 करोड़ रुपये के सीधे गबन के मामले भी पकड़ में आए हैं. इसके अलावा, 688 करोड़ रुपये ऐसे हैं, जिनकी वसूली संबंधित अधिकारियों या एजेंसियों से की जानी थी. यह राशि गलत तरीके से खर्च की गई, लेकिन जिम्मेदार पदाधिकारियों से अब तक इसकी वसूली नहीं हो सकी है. यह स्थिति बताती है कि न केवल पैसे का दुरुपयोग हुआ, बल्कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई में भी भारी लापरवाही बरती गई.

476 करोड़ का एडवांस और 180 करोड़ का गलत मद में खर्च

अलग-अलग विभागों ने 476 करोड़ रुपये एडवांस के तौर पर लिये थे. ऑडिट के दौरान इस राशि के समायोजन का निर्देश दिया गया, लेकिन विभागों ने इस पर भी कोई गंभीरता नहीं दिखाई. इसके अलावा, 180 करोड़ रुपये ऐसे मदों में खर्च किए गए, जिनकी अनुमति ही नहीं थी. इस पर ऑडिट विभाग ने कड़ी आपत्ति जताई है और इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में रखा है.

वित्त विभाग की बैठक में हुआ बड़ा खुलासा

वित्तीय अनियमितता का यह बड़ा मामला वित्त विभाग की बैठक में उजागर हुआ. तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए ऑडिट विभाग को स्पेशल ऑडिट कराने का निर्देश दिया था. एक साल के भीतर यह स्पेशल ऑडिट पूरा किया गया, जिसमें विभागों की उदासीनता और हजारों करोड़ की गड़बड़ी सामने आई. रिपोर्ट आने के बाद भी हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ.

सचिवों के साथ बैठक, फिर भी ठंडे बस्ते में मामला

ऑडिट रिपोर्ट के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने वर्ष 2022 और 2023 में राज्य सरकार के सभी विभागों के सचिवों के साथ बैठक की. इन बैठकों में साफ निर्देश दिया गया कि ऑडिट आपत्तियों के आलोक में कार्रवाई सुनिश्चित की जाए. इसके बावजूद, यह मामला करीब दो वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. बाद में वर्तमान वित्त मंत्री ने पूर्व वित्त मंत्री के निर्देशों के आधार पर फिर से कार्रवाई शुरू करने के संकेत दिए और विभागीय सचिवों की बैठक बुलाने के लिए पत्र लिखा गया.

10 हजार करोड़ का अता-पता नहीं: रामेश्वर उरांव

पूर्व वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव ने इस मामले पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकार के करीब 10 हजार करोड़ रुपये का कोई अता-पता नहीं है. उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी राशि कहां गई, यह विभाग नहीं बता पा रहे हैं और सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती. उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऑडिट की आपत्तियों पर कार्रवाई करना विभाग प्रमुखों की जिम्मेदारी है और इसमें किसी तरह की ढिलाई स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए.

ऑडिट विभाग की भूमिका और सीमाएं

राज्य सरकार के खर्च की निगरानी के लिए ऑडिट विभाग बनाया गया है. विभागों को जारी की गई राशि के आधार पर ऑडिट किया जाता है और खर्च से जुड़े बिल, कैश बुक और दूसरे दस्तावेजों की जांच होती है. जहां खर्च नियमों के अनुसार पाया जाता है, वहां ऑडिट आपत्ति ड्रॉप कर दी जाती है. लेकिन, जहां अनियमितता मिलती है, वहां रिपोर्ट वित्त विभाग के माध्यम से संबंधित विभागों को भेजी जाती है. कार्रवाई की जिम्मेदारी विभागीय प्रमुखों पर होती है.

कार्रवाई का अधिकार नहीं, मैनपावर की भी भारी कमी

सबसे बड़ी समस्या यह है कि ऑडिट विभाग के पास कार्रवाई का अधिकार नहीं है. वह केवल गड़बड़ी पकड़ सकता है और आपत्ति दर्ज कर सकता है. इसके बाद कार्रवाई करना विभागों पर निर्भर करता है, जहां अक्सर मामले दबा दिए जाते हैं. इसके अलावा, ऑडिट निदेशालय में मैनपावर की भी भारी कमी है. विभाग में 250 से अधिक स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 20 से 22 ऑडिटर ही कार्यरत हैं. रांची मुख्यालय सहित देवघर, हजारीबाग और राजधानी क्षेत्रीय कार्यालयों में भी पर्याप्त स्टाफ नहीं है.

वित्तीय अनुशासन पर बड़ा सवाल

9737 करोड़ रुपये के खर्च का हिसाब न होना झारखंड में वित्तीय अनुशासन की स्थिति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. यदि समय पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह राशि हमेशा के लिए सरकारी खजाने से गायब मानी जाएगी. विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल नियमित और प्रभावी ऑडिट, जवाबदेही तय करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई के बिना इस तरह की अनियमितताओं पर रोक लगाना मुश्किल है. यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों को भी उजागर करता है.

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