रांची, 24 अक्टूबर 2026: झारखंड हाईकोर्ट ने बर्खास्त जेल क्लर्क महेंद्र राम की अपील पर सुनवाई करते हुए उन्हें आंशिक राहत दी है। अदालत ने विभागीय जांच में उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन बर्खास्तगी की सजा की मात्रा पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। इसके लिए मामला गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अपर मुख्य सचिव के पास वापस भेजा गया है।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संबंधित प्राधिकारी अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर सजा की मात्रा पर नया निर्णय लें।
1983 में जेल विभाग में हुई थी नियुक्ति
महेंद्र राम की नियुक्ति वर्ष 1983 में हजारीबाग केंद्रीय जेल में सिपाही के पद पर हुई थी। वर्ष 1999 में उन्हें क्लर्क बनाया गया। इसके बाद 2013 में उनका तबादला गोड्डा मंडल कारा में किया गया, जहां उन्हें सहायक अधीक्षक का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया था।
विभागीय जांच के दौरान जेल में सामान की खरीद और भुगतान से संबंधित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए। इन्हीं आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई।
दो फर्मों को अधिक भुगतान का था आरोप
मामले के अनुसार, अप्रैल और मई 2013 में मेसर्स साहेब ट्रेडर्स को कुल 5,81,443 रुपये का कथित अधिक भुगतान किया गया था। इसमें 3,38,878 रुपये और 2,42,565 रुपये की दो रकम शामिल थीं। इसके अलावा, जून 2013 में मेसर्स इशरत एंटरप्राइजेज को 62,336 रुपये अधिक दिए जाने की बात जांच में सामने आई।
मार्च 2016 में महेंद्र राम को निलंबित कर आरोपपत्र दिया गया। विभागीय जांच पूरी होने के बाद 28 नवंबर 2016 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। वर्ष 2019 में उनकी विभागीय अपील खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की, जिसे 2022 में एकल पीठ ने खारिज कर दिया था।
एकल पीठ के फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने खंडपीठ में अपील दायर की थी।
अपील में बर्खास्तगी की सजा को बताया गया अनुपातहीन
महेंद्र राम की ओर से अधिवक्ता शिल्पी गाड़ोदिया ने अदालत में दलील दी कि इसी मामले में तत्कालीन प्रभारी अधीक्षक को विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्त कर दिया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि जिन फर्मों को अधिक भुगतान हुआ था, उन्होंने संबंधित राशि वापस कर दी थी।
अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि इन परिस्थितियों को देखते हुए सेवा से बर्खास्तगी की सजा आरोपों की तुलना में अत्यधिक कठोर है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से एएजी-III आशुतोष आनंद ने विभागीय जांच का बचाव किया। उन्होंने कहा कि जांच की प्रक्रिया में कोई खामी नहीं थी और महेंद्र राम को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया गया था। राज्य की ओर से स्टॉक रजिस्टर में काट-छांट, ओवरराइटिंग और व्हाइटनर के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया।
दोषसिद्धि में दखल देने से हाईकोर्ट ने किया इनकार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा के दौरान अदालत मुख्य रूप से यह देखती है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया निष्पक्ष और कानून के अनुरूप थी या नहीं। इस प्रक्रिया में सामान्यतः विभागीय जांच के साक्ष्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं किया जाता।
खंडपीठ को जांच प्रक्रिया में ऐसी कोई खामी नहीं मिली, जिसके आधार पर दोषसिद्धि को रद्द किया जा सके। ब्लैकलिस्ट की गई फर्म को भुगतान और रजिस्टर में कथित छेड़छाड़ जैसे पहलुओं को देखते हुए अदालत ने दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सजा की मात्रा पर विचार नहीं करने को अदालत ने माना अहम
हालांकि, सजा के प्रश्न पर अदालत ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। पीठ ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए कहा कि कथित अनियमितताओं के लिए अपीलकर्ता को अकेले जिम्मेदार मानने के पहलू पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था। मामले में प्रभारी अधीक्षक की भूमिका का उल्लेख था, लेकिन उन्हें विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्त कर दिया गया था।
अदालत ने यह भी गौर किया कि जून 2013 में साहेब ट्रेडर्स को अधिक भुगतान के बजाय कम भुगतान होने की बात सामने आई थी। इसके अतिरिक्त, अधिक भुगतान की राशि संबंधित फर्मों द्वारा लौटाए जाने का तर्क भी अपीलकर्ता की ओर से रखा गया था।
खंडपीठ के अनुसार, अनुशासनिक प्राधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी ने सजा तय करते समय इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया। अदालत ने यह भी पाया कि 23 अक्टूबर 2019 के अपीलीय आदेश में सजा की मात्रा के औचित्य पर स्पष्ट चर्चा नहीं की गई थी।
छह सप्ताह के भीतर नया निर्णय लेने का निर्देश
हाईकोर्ट ने एकल पीठ के आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें बर्खास्तगी की सजा की मात्रा को सही ठहराया गया था। इसके बाद मामले को गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अपर मुख्य सचिव के पास पुनर्विचार के लिए भेज दिया गया।
अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित अधिकारी केवल सजा की मात्रा पर नए सिरे से विचार करें और आदेश की प्रति प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर निर्णय लें। इस तरह महेंद्र राम की दोषसिद्धि बरकरार है, जबकि उनकी सजा की मात्रा पर अंतिम निर्णय अब विभागीय प्राधिकारी को करना है।
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