पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अस्थिरता के कारण भारतीय शेयर बाजार पिछले चार हफ्तों से लगातार गिरावट का सामना कर रहा है. हालांकि शुक्रवार को बाजार में थोड़ी रिकवरी देखी गई, लेकिन पूरे हफ्ते के दौरान बिकवाली का जबरदस्त दबाव बना रहा. सप्ताह के अंत में निफ्टी 0.16 प्रतिशत गिरकर 23,114 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स 0.04 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 74,532 के स्तर पर रहा.
बाजार गिरने के मुख्य कारण
बाजार में इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. चूंकि भारत अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए महंगे तेल से देश में महंगाई और व्यापार घाटा बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है.
दूसरा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों (FIIs) की ओर से की जा रही भारी बिकवाली है. पिछले 13 दिनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार से लगभग 81,263 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं. इसके साथ ही, डॉलर की बढ़ती मांग के कारण भारतीय रुपया भी अपने सबसे निचले स्तर ₹93.49 प्रति डॉलर पर पहुंच गया है, जिससे निवेशकों का भरोसा डगमगाया है.
सेक्टरों का हाल
बाजार में छाई इस मंदी के बावजूद ‘निफ्टी मेटल’ इंडेक्स में 2 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी देखी गई. मेटल शेयरों में खरीदारी बढ़ने की मुख्य वजह मांग में सुधार की उम्मीद और ब्रोकरेज फर्मों की सकारात्मक रिपोर्ट रही. इसके अलावा, आईटी (IT) और सरकारी बैंकों (PSU Banks) के शेयरों में भी कुछ सुधार देखा गया. हालांकि, छोटे और मझोले शेयरों (स्मॉलकैप और मिडकैप) में गिरावट का दौर जारी रहा.
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के रिसर्च हेड सिद्धार्थ खेमका के अनुसार, “आने वाले दिनों में बाजार का रुख सतर्कता भरा रहेगा. जब तक पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक बाजार पर दबाव बना रह सकता है.”
जानकारों के मुताबिक, निफ्टी के लिए 22,950 और 22,700 का स्तर मजबूत सपोर्ट (सहारा) का काम करेगा. वहीं, ऊपर की ओर 23,850 और 24,000 का स्तर एक बड़ी बाधा (रेजिस्टेंस) साबित हो सकता है. बाजार अपने उच्चतम स्तर से अब तक लगभग 13% नीचे गिर चुका है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय बाजार फिलहाल एक बड़े सुधार के दौर से गुजर रहा है.


