पलामूः महाराष्ट्र के तरबूज गर्मी में लोगों को ठंड का अहसास दिला रही है. गर्मी के दिनों में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाला फल तरबूज है. झारखंड के कई हिस्सों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है. बाजार में तरबूज की मांग भी बढ़ गई है. पलामू के बाजार तरबूज से भर गए हैं. यह तरबूज महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से बाजारों में पहुंच रहे हैं. पलामू के इलाके में प्रतिदिन 60 से अधिक टन तरबूज की खपत हो रही है. पलामू प्रमंडलीय मुख्यालय मेदिनीनगर में तरबूज की खेप पहूंचती है उसके बाद पूरे जिले के बाजारों में जाती है. तरबूज की मांग तेजी से बाजारों में बढ़ रही है, प्रत्येक दो से तीन दिनों में तरबूज की बड़ी खेप महाराष्ट्र से पलामू में पहुंचती है.
महाराष्ट्र के तरबूज में अधिक मिठास
महाराष्ट्र के इलाकों से पहुंचने वाले तरबूज में मिठास अधिक होती है. पिछले पांच वर्षों में मराठी तरबूज की मांग बाजार में तेजी से बढ़ती जा रही है. झारखंड और बिहार के इलाकों से तरबूज अप्रैल के पहले दो हफ्ते के बाद बाजार में आने लगते हैं. जबकि महाराष्ट्र का तरबूज फरवरी और मार्च से ही बाजार में उपलब्ध होना शुरू हो जाता है. महाराष्ट्र का तरबूज स्थानीय तरबूज से थोड़ा महंगा होता है. महाराष्ट्र का तरबूज पलामू के बाजारों में 25 से 30 रुपए किलो बिक रहा है. हालात और बाजार के हिसाब से यह रेट घटते बढ़ते रहते हैं.
‘रमजान के समय से ही महाराष्ट्र का तरबूज बाजारों में आ गया है. वहां के तरबूज की मांग तेजी से बढ़ रही है और लोग इसे पसंद भी कर रहे हैं. –अफरोज मोहम्मद, तरबूज के थोक कारोबारी
‘महाराष्ट्र का तरबूज खाने में काफी मीठा होता है, इस मौसम में लोकल तरबूज काफी कच्चा निकलता है. महाराष्ट्र का तरबूज महंगा है जबकि लोकल सस्ता पड़ता है. महाराष्ट्र के तरबूज को चिरन तरबूज भी कह कर बुलाते हैं.’ मोहम्मद मजमूल, कारोबारी
‘इस बार अच्छे कारोबार की उम्मीद है, गर्मी बढ़ेगी तो तरबूज की मांग भी बढ़ेगी. पिछले वर्ष तरबूज का कारोबार अच्छा नहीं रहा था. बारिश एवं मौसम ने तरबूज के कारोबार को प्रभावित किया था.
झारखंड एवं बिहार के इलाके में मौसम के बदलाव के कारण तरबूज की फसल प्रभावित हुई है. झारखंड के लोहरदगा, गुमला, रांची, लातेहार समेत कई इलाकों में बड़े पैमाने पर तरबूज की पैदावार होती है जबकि बिहार में सोन के तटवर्ती क्षेत्रों में पैदावार होती है. फिलहाल झारखंड एवं बिहार के इलाके का तरबूज बाजारों में नहीं पहुंचा है क्योंकि इन दोनों इलाके के तरबूज पके नहीं हैं. बारिश के कारण दोनों राज्यों में तरबूज की फसल को नुकसान हुआ है जिस कारण बाजारों में तरबूज नहीं पहुंच रहा है. 2025 में भी मौसम ने तरबूज की फसल एवं इसके कारोबार को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया था. 2026 में भी मौसम ने प्रभावित किया है.


