गिरिडीह: झारखंड राज्य अलग आंदोलन और झारखंड राज्य का जब भी जिक्र होता है सबसे पहले किसी की तस्वीर जेहन में घूमती है तो वह शिबू सोरेन हैं. दिशोम गुरु के तौर पर जाने जाने वाले शिबू ने जन आंदोलन की शुरुआत गिरिडीह के पीरटांड़ और धनबाद के टुंडी के सीमाई इलाके से की थी. इन्हीं प्रखंड के सीमा पर अवस्थित पोखरिया में उन्होंने अपने समर्थकों के साथ डेरा डाला था.
शिबू सोरेन अपने सहयोगी श्यामलाल मुर्मू के मिट्टी के घर में रहते और महाजनी प्रथा के साथ-साथ शोषण वर्ग के खिलाफ लोगों का जुटान करते थे. इसी पोखरिया से उन्होंने महाजनी प्रथा, अशिक्षा के साथ-साथ हड़िया-दारू के खिलाफ भी आंदोलन को धार दिया था. आज भी यह आश्रम है. वर्तमान में इस आश्रम का देखभाल स्व श्यामलाल की पत्नी बहाली मुर्मू, पुत्र प्रदीप के साथ-साथ बहू लीलावती प्रमुख रूप से करती है.
बहाली को याद है गुरुजी की बातें
शिबू सोरेन के प्रमुख सहयोगियों में से एक श्यामलाल मुर्मू इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन स्व श्याम की पत्नी बहाली को गुरुजी की बातें याद हैं. वह बताती हैं कि जब गुरूजी यहां रहते थे तो लोगों की भीड़ उमड़ी रहती थी. लोग अपनी परेशानी लेकर पहुंचते, जिसका हल गुरूजी निकालते थे. बहाली के पुत्र प्रदीप बताते हैं कि उनके दिवंगत पिता श्यामलाल बताते थे कि गुरूजी हमेशा झारखंड को अलग राज्य बनाने, महाजनी प्रथा को खत्म करने की बात कहते थे. उन्होंने बताया कि उनके पिता कहते थे कि उस वक्त पुलिस भी गुरूजी को खूब परेशान करती थी.

गांव में स्कूल-स्वास्थ्य सुविधा का अभाव
प्रदीप और उनकी पत्नी लीलावती बताती हैं कि उनके गांव में सरकारी स्कूल था, जिसे एक किमी दूर दूसरे गांव के स्कूल में मर्ज कर दिया गया. अब बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने में भी परेशानी होती है. लीलावती बताती हैं कि आस-पास में सरकारी स्वास्थ्य सुविधा भी नहीं है. इलाज के लिए टुंडी जाना पड़ता है. इन दोनों ने बताया कि उन्हें भी कई तरह की अन्य सरकारी सुविधा नहीं मिली है. लीलावती कहती हैं उन्हें मंईयां सम्मान योजना का लाभ नहीं मिलता है. आवास की सुविधा भी नहीं मिली है.

प्रदीप और लीलावती कहती है कि पोखरिया का यह आश्रम ऐतिहासिक है. ऐसे में इस आश्रम का कायाकल्प होना चाहिए. उन दोनों ने कहा कि इस आश्रम पर कुछ ऐसा हो, जिससे की राज्य का हर एक व्यक्ति इस आश्रम को जान सकें.


