भारत की ऊर्जा यात्रा में पिछले कुछ दशक ऐतिहासिक रहे हैं. कभी शहरों के रईस परिवारों तक सीमित रहने वाली रसोई गैस (LPG) आज देश के दूर-दराज के गांवों और गरीब झोपड़ियों तक पहुँच चुकी है. यह केवल ईंधन का बदलाव नहीं है, बल्कि करोड़ों महिलाओं के स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीवन स्तर में आया एक क्रांतिकारी सुधार है.
LPG का व्यावसायिक सफर (1970 – 1990)
भारत में LPG का व्यावसायिक सफर 1950 के दशक में शुरू हुआ था, लेकिन 1970 के दशक में इसने रफ्तार पकड़ी. उस समय गैस सिलेंडर का होना एक ‘स्टेटस सिंबल’ माना जाता था. 1977 में पूरे देश में मात्र 32 लाख एलपीजी कनेक्शन थे, जो कुल परिवारों का केवल 2.5 प्रतिशत था.
1980 और 90 के दशक में गैस कनेक्शन पाना किसी चुनौती से कम नहीं था. लंबी वेटिंग लिस्ट और सीमित गैस एजेंसियों के कारण मध्यम वर्ग के लिए भी यह एक कठिन सुविधा थी. 1990 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 1.96 करोड़ तक पहुँची. उस समय ग्रामीण भारत पूरी तरह से लकड़ी, कोयले और उपलों (गोबर के कंडे) पर निर्भर था, जिससे निकलने वाला धुआं महिलाओं में श्वसन संबंधी बीमारियों का बड़ा कारण बनता था.
सरकारी पहल से विस्तार (2000 – 2015)
2000 के दशक की शुरुआत में सरकारों ने महसूस किया कि बिना ग्रामीण विस्तार के देश का विकास अधूरा है. दक्षिण भारतीय राज्यों ने सबसे पहले बीपीएल (BPL) परिवारों को मुफ्त या रियायती कनेक्शन देने की शुरुआत की. इसके बाद 2009 में ‘राजीव गांधी ग्रामीण एलपीजी वितरण योजना’ शुरू हुई, जिसने गांवों में वितरकों का जाल बिछाना शुरू किया. इस योजना ने बुनियादी ढांचे की नींव रखी, ताकि गैस सिलेंडर की पहुंच आसान हो सके.
उज्जवला योजना बनी गेम-चेंजर (2016 – वर्तमान)
LPG के इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ मई 2016 में आया, जब केंद्र सरकार ने ‘प्रधानमंत्री उज्जवला योजना’ (PMUY) की शुरुआत की. इसका मुख्य उद्देश्य गरीब परिवारों की महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाना था.
इस योजना के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. शुरुआती दो वर्षों में ही लगभग 4 करोड़ परिवारों को कनेक्शन दिए गए. अप्रैल 2025 तक उज्जवला लाभार्थियों की संख्या 10.33 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है. आज भारत में घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं की कुल संख्या 33 करोड़ को पार कर गई है, जो 2014 में मात्र 14.5 करोड़ थी.
बुनियादी ढांचे में भारी निवेश
बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार और तेल कंपनियों ने बुनियादी ढांचे को अभूतपूर्व तरीके से बढ़ाया है.
- वितरक नेटवर्क: देश में गैस वितरकों की संख्या लगभग 13,896 से बढ़कर 25,500 से अधिक हो गई है.
- ग्रामीण पहुंच: ग्रामीण क्षेत्रों में वितरकों की संख्या 6,724 से बढ़कर 17,641 हो गई है, जिससे अब सिलेंडर की होम डिलीवरी गांवों में भी संभव हो पा रही है.
- रिफिल औसतः उज्जवला लाभार्थियों द्वारा सिलेंडर के इस्तेमाल की दर भी बढ़ी है. 2017 में जो परिवार साल में औसतन 3.9 सिलेंडर इस्तेमाल करते थे, 2025 तक यह आंकड़ा 4.5 सिलेंडर तक पहुँचने की उम्मीद है.
आयात पर निर्भरता और चुनौतियां
जैसे-जैसे खपत बढ़ी, भारत की आयात पर निर्भरता भी बढ़ गई है. 2011-12 में भारत 6 मिलियन मीट्रिक टन गैस आयात करता था, जो 2024-25 में बढ़कर 21 मिलियन मीट्रिक टन होने का अनुमान है. आज भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% LPG विदेशों से मंगाता है.
हाल के समय में लाल सागर और फारस की खाड़ी में भू-राजनीतिक तनाव के कारण आपूर्ति में कुछ बाधाएं देखी गई हैं, जिससे निपटने के लिए भारत अब अमेरिका, कनाडा और अल्जीरिया जैसे नए देशों से दीर्घकालिक समझौते कर रहा है.
निष्कर्ष: अभी राह बाकी है
यद्यपि LPG की पहुंच लगभग 100% परिवारों तक हो चुकी है, लेकिन ‘नियमित उपयोग’ अभी भी एक बड़ी चुनौती है. ‘नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे’ (NFHS-5) के अनुसार, ग्रामीण भारत में आज भी कई परिवार महंगे सिलेंडर के कारण लकड़ी और ठोस ईंधन का साथ पूरी तरह नहीं छोड़ पाए हैं.
आने वाले वर्षों में सरकार का लक्ष्य सब्सिडी के बेहतर प्रबंधन और पाइप वाली प्राकृतिक गैस (PNG) के विस्तार के माध्यम से इस अंतर को पाटना है. भारत की यह LPG यात्रा आत्मनिर्भरता और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण है.


