नई दिल्ली: भारत की अग्रणी उर्वरक सहकारी संस्था, इफको (IFFCO) ने भारतीय कृषि क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए स्वदेशी रूप से विकसित ‘नैनो एनपीके’ उर्वरक लॉन्च किए हैं. यह नवाचार न केवल भारत को उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यह टिकाऊ खेती के लिए भी गेम-चेंजर साबित होने वाला है.
दो स्वरूपों में उपलब्ध: लिक्विड और दानेदार
इफको ने जानकारी दी है कि उसने नैनो एनपीके लिक्विड (8-8-10) और नैनो एनपीके ग्रेनुलर यानी दानेदार (20-10-10) पेश किए हैं. इन दोनों उत्पादों को उर्वरक नियंत्रण आदेश के तहत भारत सरकार से मंजूरी मिल गई है. दुनिया में अपनी तरह का यह पहला प्रयोग है जहाँ फसलों को संतुलित पोषण देने के लिए छिड़काव और जड़ दोनों तरीकों को एकीकृत किया गया है.
किसानों को क्या होगा फायदा?
पारंपरिक खाद की भारी-भरकम बोरियों के मुकाबले नैनो एनपीके के कई फायदे हैं.
- सटीक पोषण: नैनो कण पौधों की कोशिकाओं में आसानी से समा जाते हैं, जिससे पोषक तत्वों की बर्बादी कम होती है और पौधों को सीधा पोषण मिलता है.
- लागत में कमी: नैनो उर्वरकों का परिवहन और भंडारण आसान है, जिससे किसानों की इनपुट लागत कम होगी.
- मिट्टी की सेहत: रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से खराब हो रही मिट्टी की उर्वरक शक्ति को बचाने में यह सहायक होगा.
- बेहतर पैदावार: सटीक मात्रा में पोषण मिलने से फसलों की गुणवत्ता और पैदावार, दोनों में सुधार होगा.
आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम
वर्तमान में भारत अपनी उर्वरक जरूरतों के लिए एक बड़े हिस्से का आयात करता है. वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के कारण अक्सर उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव रहता है. इफको का यह स्वदेशी आविष्कार विदेशी मुद्रा बचाने और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा. यह प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन को मजबूती प्रदान करता है.
पर्यावरण के अनुकूल
पारंपरिक उर्वरकों का एक बड़ा हिस्सा मिट्टी में बह जाता है या हवा में उड़ जाता है, जिससे प्रदूषण होता है. नैनो तकनीक के उपयोग से पोषक तत्वों के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ती है, जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव न्यूनतम हो जाता है.
इफको का यह कदम भारतीय किसानों के लिए आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान का एक बेहतरीन संगम है, जो भविष्य में खेती को अधिक लाभदायक और सुरक्षित बनाएगा.


