चैत्र छठ हिंदू धर्म का एक बेहद पवित्र त्योहार है. व्रत के दौरान छठ से जुड़ी व्रत कथाओं का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है. वैसे तो छठ से जुड़ी अनेक कथाएं हैं, जिनमें से एक के बारे में हमने इस आर्टिकल में बताया है.
आस्था और शुद्धता का महापर्व चैत्र छठ आज, 22 मार्च 2026 से नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया है. यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का सबसे कठिन और फलदायी व्रत माना जाता है. कहते है कि इस व्रत को करने भक्तों के सार दुख और कष्ट दुर होते है और सुख-समृद्धी का आर्शिवाद प्राप्त होता है. मान्यता है कि महाभारत काल में जब पांडव वनवास के संकट से जूझ रहे थे, तब स्वयं माता द्रौपदी ने अपने पतियों के कष्ट दूर करने के लिए यह व्रत रखा था.
पौराणिक कथा
कथा के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हार गए और उन्हें वनवास भोगना पड़ा, तब वे गहरे मानसिक कष्ट से गुजर रहे थे. एक राजा होने के नाते युधिष्ठिर के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब आई, जब वन में उनके आश्रम में कई तपस्वी ऋषि पधारे. युधिष्ठिर इस चिंता में डूब गए कि इन महात्माओं के भोजन और सत्कार का प्रबंध इस अभाव में कैसे होगा.
अपने पतियों को चिंता में देख माता द्रौपदी का हृदय कांप उठा. उन्होंने अपने कुल गुरु धौम्य जी से प्रार्थना की “हे आचार्य! कोई ऐसा मार्ग बताएं जिससे मेरे पतियों का कष्ट दूर हो, खोया हुआ सम्मान वापस मिले और घर में फिर से खुशहाली आए.”
द्रौपदी की करुण पुकार सुनकर गुरु धौम्य ने उन्हें ‘रवि षष्ठी व्रत’ (जिसे आज हम छठ पूजा के नाम से जानते हैं) की महिमा बताई. उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में नागकन्या के उपदेश से सुकन्या ने भी यही व्रत किया था, जिससे उनके जीवन के सभी संकट टल गए थे.
गुरु के आदेशानुसार द्रौपदी ने पूरी निष्ठा और शुद्धता के साथ सूर्य देव और षष्ठी माता की उपासना की. इस व्रत के प्रभाव से सूर्य देव प्रसन्न हुए और पांडवों को ‘अक्षय पात्र’ प्रदान किया, जिससे उनके भोजन का संकट सदैव के लिए समाप्त हो गया. इसी व्रत के पुण्य प्रताप से अंततः पांडवों ने युद्ध में विजय प्राप्त की और अपना खोया हुआ वैभव वापस पाया.


