Wednesday, February 4, 2026

अमेरिका-भारत व्यापार समझौते से कृषि निर्यात बढ़ेगा, टैरिफ घटेगा, अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने इस समझौते की सराहना की

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 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए व्यापार समझौते को ‘सदी की सबसे बड़ी डील’ करार दिया जा रहा है. जहां भारत को टैरिफ में राहत मिली है, वहीं इस समझौते का सबसे बड़ा विजेता अमेरिकी कृषि क्षेत्र और ऊर्जा उद्योग बनकर उभरा है. अमेरिकी प्रशासन के शीर्ष नेताओं ने इसे अमेरिकी श्रमिकों और किसानों की ऐतिहासिक जीत बताया है.

अमेरिकी किसानों की ‘लॉटरी’
अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने इस समझौते की सराहना करते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति को साबित किया है. आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में भारत के साथ अमेरिका का कृषि व्यापार घाटा 1.3 अरब डॉलर था. यानी अमेरिका, भारत से कृषि उत्पाद ज्यादा खरीद रहा था और वहां भेज कम पा रहा था.

इस नई डील के बाद, भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों पर लगे प्रतिबंधों और ऊंचे टैरिफ को कम करने पर सहमति जताई है. भारत की विशाल आबादी और बढ़ती क्रय शक्ति (Purchasing Power) अब अमेरिकी सोयाबीन, मक्का, कपास और डेयरी उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार बनेगी. इससे न केवल व्यापार घाटा कम होगा, बल्कि अमेरिका के ग्रामीण इलाकों और कृषि प्रधान राज्यों में भारी नकदी का प्रवाह बढ़ेगा.

$500 बिलियन की ऊर्जा कूटनीति
समझौते का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा क्षेत्र है. अमेरिकी आंतरिक मंत्री डग बर्गम ने इसे ‘ऊर्जा कूटनीति’ (Energy Diplomacy) का नाम दिया है. समझौते के तहत भारत ने अमेरिका से रिकॉर्ड $500 बिलियन की ऊर्जा, तकनीक, कोयला और एलएनजी (LNG) खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है.

यह डील अमेरिका को ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. भारत अब रूस से तेल खरीदना बंद कर अमेरिका से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा. इससे अमेरिकी तेल रिफाइनरियों और कोयला खदानों को दशकों तक चलने वाला एक सुनिश्चित ग्राहक मिल गया है, जिससे वहां रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे.

रूस पर लगाम और आर्थिक मजबूती
सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष जिम रिश ने स्पष्ट किया कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है. भारत का रूसी ऊर्जा क्षेत्र से दूरी बनाना रूस की अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रहार है. इसके बदले में अमेरिकी सामान की खरीद बढ़ने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर की स्थिति वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत होगी.

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