Friday, October 30, 2026

Mid-Day Meal Crisis: झारखंड के 33 हजार स्कूलों के हेडमास्टर संकट में, 7 महीने तक वेतन से कराया बच्चों को भोजन

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रांची | 29 अक्टूबर 2026 | BharatSuperFastNews

Ranchi News: झारखंड में मध्याह्न भोजन योजना को लेकर सरकारी स्कूलों के हेडमास्टरों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। आरोप है कि पिछले सात महीनों तक योजना के लिए समय पर राशि उपलब्ध नहीं होने के कारण हेडमास्टरों को अपने वेतन से बच्चों के भोजन की व्यवस्था करनी पड़ी। अब विभाग ने जिलों को राशि उपलब्ध कराई है, लेकिन भुगतान की नई व्यवस्था ने शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है।

नए नियम के अनुसार, मध्याह्न भोजन के लिए खरीदी जाने वाली सामग्री का भुगतान सीधे वेंडर के बैंक खाते में किया जाना है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिन दुकानदारों से स्कूलों ने पहले ही राशन और अन्य जरूरी सामग्री खरीदी है, उनके भुगतान की भरपाई कैसे होगी।

सात महीने तक शिक्षकों ने अपनी जेब से किया खर्च

रिपोर्ट के मुताबिक, मध्याह्न भोजन योजना के तहत सात महीने तक राशि उपलब्ध नहीं होने से स्कूलों में बच्चों को भोजन कराने में परेशानी हुई। बच्चों को खाना मिलता रहे, इसके लिए कई हेडमास्टरों ने अपने वेतन से खर्च किया। कुछ मामलों में दुकानदारों से उधार लेकर राशन और अन्य सामग्री की व्यवस्था भी की गई।

अब राशि जारी होने के बाद भी हेडमास्टरों के सामने समस्या बनी हुई है। नई भुगतान प्रक्रिया के तहत वेंडर के रूप में पंजीकृत दुकानदारों के खाते में ही पैसा भेजे जाने की बात कही जा रही है। इससे पहले से किए गए खर्च का भुगतान मिलने को लेकर असमंजस की स्थिति है।

ग्रामीण दुकानदारों का रजिस्ट्रेशन बड़ी चुनौती

मध्याह्न भोजन के लिए स्कूलों को सब्जी, तेल, मसाले और राशन जैसी सामग्री स्थानीय दुकानों और ग्रामीण हाट-बाजारों से खरीदनी पड़ती है। इनमें कई छोटे दुकानदार ऐसे हैं, जिनके पास जीएसटी पंजीकरण या औपचारिक बिल-रसीद की व्यवस्था नहीं है।

ऐसे में सवाल है कि क्या इन दुकानदारों को वेंडर के रूप में पंजीकृत कराना व्यावहारिक होगा? यदि पंजीकरण और दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती है, तो स्कूलों द्वारा पहले से खरीदी गई सामग्री के भुगतान में और देरी हो सकती है।

33 हजार स्कूलों के करीब 34 लाख छात्र प्रभावित योजना के दायरे में

अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश मुख्य प्रवक्ता नसीम अहमद के अनुसार, झारखंड के करीब 33 हजार स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना संचालित होती है और इससे लगभग 34 लाख छात्र जुड़े हैं।

उन्होंने कहा कि बजट या राशि उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में हेडमास्टरों को अपनी जेब से पैसे खर्च कर राशन की व्यवस्था करनी पड़ती है। कई शिक्षक दुकानदारों से उधार पर भी सामग्री लेते हैं। ऐसे में भुगतान में देरी होने से शिक्षकों को आर्थिक परेशानी के साथ दुकानदारों के तगादे का भी सामना करना पड़ रहा है।

शिक्षक संघ ने दी आंदोलन की चेतावनी

नसीम अहमद ने विभाग से इस समस्या का जल्द समाधान निकालने की मांग की है। उनका कहना है कि हेडमास्टरों द्वारा पहले से किए गए खर्च के भुगतान की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि शिक्षकों को आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विभाग ने जल्द इस मामले पर ध्यान नहीं दिया, तो पूरे झारखंड में चरणबद्ध आंदोलन किया जाएगा।

अब विभाग के सामने क्या है चुनौती?

मध्याह्न भोजन योजना के तहत जारी राशि का पारदर्शी तरीके से भुगतान सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही, पहले से अपने पैसे खर्च कर चुके हेडमास्टरों के बकाया भुगतान और ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे दुकानदारों के पंजीकरण से जुड़ी समस्याओं का समाधान भी आवश्यक है।

अब देखना होगा कि विभाग नई भुगतान व्यवस्था लागू करते हुए शिक्षकों के पुराने खर्च की भरपाई और बच्चों के लिए भोजन की नियमित व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है।

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