Thursday, August 20, 2026

Jharkhand High Court: 36 साल पुराने वेतन भुगतान की वसूली पर रोक, रिटायर्ड कर्मचारी को राहत.

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रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को राहत देते हुए करीब 36 वर्ष पुराने कथित अतिरिक्त वेतन की वसूली को उचित नहीं माना। अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर उसके वेतन या सेवानिवृत्ति संबंधी लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

यह फैसला चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनाया। खंडपीठ ने एकल पीठ के उस आदेश को अधिकांशतः बरकरार रखा, जिसमें वेतन की वसूली पर रोक लगाने और सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने पर लगाई गई रोक को हटा दिया गया।

एफआईआर दर्ज करने पर रोक हटाई

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर आपराधिक कृत्य का आरोप होने की स्थिति में एफआईआर दर्ज करने पर कानून की ओर से स्वतः रोक नहीं है। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद आरोपी को संबंधित आपराधिक अदालत में अपना पक्ष रखने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।

खंडपीठ ने कहा कि यदि जामताड़ा थाना कांड संख्या 337/2013 और दुमका थाना कांड संख्या 220/2014 अभी लंबित हैं, तो राज्य सरकार कानून के मुताबिक इन मामलों में आगे की कार्रवाई कर सकती है।

1975 में ट्रेसर पद पर हुई थी नियुक्ति

मामला तारकेश्वर प्रसाद सिंह की सेवा से जुड़ा है। उनकी नियुक्ति 13 जनवरी 1975 को ट्रेसर के पद पर हुई थी। फरवरी 1980 में उन्हें अस्थायी तौर पर जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर पदोन्नति दी गई। बाद में इस पदोन्नति को लेकर विवाद हुआ और 1986 में उन्हें दोबारा ट्रेसर के पद पर भेज दिया गया।

इसके बाद 1987 में पुराने आदेश को वापस लेते हुए उन्हें जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर फिर से बहाल कर दिया गया। बाद में इस पद पर उनकी सेवा स्थायी की गई और उन्हें एसीपी का लाभ भी मिला।

2011 में विभागीय कार्रवाई

वर्ष 2011 में सिंह को निलंबित कर उनके खिलाफ 14 आरोपों को लेकर विभागीय जांच शुरू की गई। इनमें जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद कथित तौर पर नियमों के विपरीत रखने और उस पद के अनुरूप वेतन प्राप्त करने का आरोप भी शामिल था।

जांच पूरी होने के बाद कुछ आरोप प्रमाणित माने गए। विभाग ने उन्हें निंदा की सजा दी और दो वेतन वृद्धि को बिना संचयी प्रभाव के रोकने का निर्णय लिया।

2013 और 2014 में दर्ज हुईं एफआईआर

इसके बाद विभाग की ओर से आपराधिक मामला दर्ज कराने का फैसला लिया गया। इसके तहत जामताड़ा और दुमका में अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज हुईं।

तारकेश्वर प्रसाद सिंह 31 जुलाई 2013 को सेवानिवृत्त हो गए। इसके कुछ समय बाद विभाग ने वर्ष 1986 के पुराने आदेश को फिर से लागू करते हुए उनकी पदोन्नतियां रद्द कर दीं। साथ ही ट्रेसर पद के वेतन की तुलना में कथित रूप से अधिक भुगतान की गई राशि की वसूली का आदेश भी जारी किया गया।

36 साल बाद वसूली के आदेश पर कोर्ट की आपत्ति

वसूली का आदेश 21 अप्रैल 2016 को जारी किया गया था। अदालत ने गौर किया कि जिस अतिरिक्त भुगतान को आधार बनाकर राशि वापस लेने का निर्देश दिया गया, वह 1980 में जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर मिलने वाले वेतन से संबंधित था। यानी कथित अतिरिक्त भुगतान और वसूली के आदेश के बीच करीब 36 वर्ष से अधिक का अंतर था।

हाईकोर्ट ने झारखंड पेंशन नियम, 2000 के नियम 43(बी) का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, सेवानिवृत्ति के बाद किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई या वित्तीय वसूली के लिए नियमों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

कोर्ट ने पाया कि कर्मचारी के रिटायर होने के बाद नियम 43(बी) के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कोई कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। इसके अलावा विभागीय जांच में भी यह स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकाला गया था कि कर्मचारी ने अवैध रूप से जूनियर अकाउंट्स क्लर्क का पद संभाला था।

एक ही आरोप पर दोबारा दंड देने पर भी सवाल

खंडपीठ ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित आरोप को लेकर पहले ही विभागीय जांच हो चुकी थी और कर्मचारी को दंड दिया जा चुका था। ऐसे में उसी आरोप के आधार पर बाद में फिर से दंडात्मक कार्रवाई किए जाने पर अदालत ने आपत्ति जताई।

कोर्ट ने माना कि पहले की विभागीय कार्रवाई के बाद उसी आधार पर दोबारा दंड देने की कोशिश डबल जियोपर्डी (Double Jeopardy) के सिद्धांत से जुड़ा सवाल पैदा करती है।

फैसले के परिणामस्वरूप वेतन वसूली और सेवानिवृत्ति लाभ से संबंधित एकल पीठ के निर्देश मुख्य रूप से बरकरार रहे, जबकि एफआईआर पर रोक लगाने वाला हिस्सा हटा दिया गया। अदालत ने इसके साथ याचिका का निपटारा कर दिया।

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