नई दिल्ली: भारतीय चीनी और जैव-ऊर्जा निर्माता संघ (ISMA) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू चीनी सीजन 2025-26 में भारत के चीनी उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है. 31 मार्च, 2026 तक देश का कुल चीनी उत्पादन लगभग 9 प्रतिशत बढ़कर 272.31 लाख टन तक पहुंच गया है, जो पिछले साल इसी अवधि में 248.78 लाख टन था.
राज्यों की स्थिति और मिलों का संचालन
उत्पादन में इस बढ़ोतरी के बावजूद, परिचालन में लगी चीनी मिलों की संख्या में गिरावट आई है. आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में केवल 56 मिलें ही चल रही हैं, जबकि पिछले साल इस समय 95 मिलें सक्रिय थीं.
प्रमुख उत्पादक राज्यों की स्थिति इस प्रकार है
उत्तर प्रदेश: यहां उत्पादन लगभग 87.5 लाख टन रहा है, जो पिछले साल के बराबर है. हालांकि, राज्य में केवल 28 मिलें चल रही हैं, जबकि पिछले साल 48 मिलें चल रही थीं.
महाराष्ट्र और कर्नाटक: इन दोनों राज्यों में उत्पादन में बड़ा उछाल देखा गया है. महाराष्ट्र का उत्पादन पिछले साल के 80.26 लाख टन से बढ़कर 99.3 लाख टन हो गया है. वहीं, कर्नाटक ने पिछले साल के 39.94 लाख टन के मुकाबले 47.90 लाख टन का उत्पादन किया है.
MSP में वृद्धि की मांग
चीनी सीजन के अंतिम चरण में पहुंचने के साथ ही उद्योग जगत ने सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में जल्द बढ़ोतरी की अपील की है. ISMA का कहना है कि उत्पादन लागत में वृद्धि और मिलों को मिलने वाली कम कीमतों के कारण चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है. इससे किसानों के गन्ना भुगतान में देरी (बकाया) होने की संभावना बढ़ गई है. उद्योग का मानना है कि MSP में संशोधन से मिलों की व्यवहार्यता बनी रहेगी और किसानों के हितों की रक्षा होगी.
एथेनॉल और अन्य चुनौतियां
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच एथेनॉल सम्मिश्रण (Ethanol Blending) कार्यक्रम में तेजी लाना आवश्यक है. इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी बल्कि चीनी क्षेत्र को भी अतिरिक्त आय होगी.
दूसरी ओर, बाजार में एलपीजी (LPG) आपूर्ति की बाधाओं के कारण चीनी की खपत पर भी असर पड़ा है. कई खाद्य प्रतिष्ठानों और होटलों के अस्थायी रूप से बंद होने या सीमित परिचालन के कारण चीनी की मांग में कमी आई है, जिसने उद्योग की चिंताएं बढ़ा दी हैं.


