वैश्विक वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाली प्रमुख संस्था IQAir ने अपनी 8वीं वार्षिक ‘वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट 2025’ जारी कर दी है. यह रिपोर्ट दुनिया भर के 143 देशों और क्षेत्रों के 9,446 शहरों से प्राप्त वायु प्रदूषण के आंकड़ों का एक व्यापक विश्लेषण पेश करती है. इस साल की रिपोर्ट के नतीजे चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं, जो बताते हैं कि दुनिया के केवल 14% शहर ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सुरक्षित मानकों को पूरा कर पा रहे हैं.
रिपोर्ट का आधार और कार्यप्रणाली
IQAir की यह रिपोर्ट दुनिया भर के 40,000 से अधिक रेगुलेटरी मॉनिटरिंग स्टेशनों और कम लागत वाले (low-cost) सेंसर्स से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है. इन स्टेशनों का संचालन सरकारी एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, गैर-लाभकारी संगठनों, निजी संस्थाओं और जागरूक नागरिक वैज्ञानिकों द्वारा किया जाता है.

रिपोर्ट में प्रदूषण को मापने के लिए PM2.5 (सूक्ष्म कण जो फेफड़ों में गहराई तक जा सकते हैं) को आधार बनाया गया है. इन आंकड़ों को माइक्रोोग्राम प्रति घन मीटर (µg/m³) में दर्ज किया गया है. IQAir का रीयल-टाइम प्लेटफॉर्म इन आंकड़ों को सत्यापित (validate) और कैलिब्रेट (calibrate) करता है, ताकि डेटा पूरी तरह सटीक और विश्वसनीय रहे.
दुनिया के सबसे प्रदूषित देश: दक्षिण एशिया की हालत गंभीर
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे प्रदूषित क्षेत्र बना हुआ है. पाकिस्तान 67.3 µg/m³ की औसत PM2.5 सांद्रता के साथ दुनिया का सबसे प्रदूषित देश रहा. इसके बाद दूसरे स्थान पर बांग्लादेश (66.1 µg/m³) और तीसरे पर ताजिकिस्तान (57.3 µg/m³) का स्थान है. अफ्रीका का देश चाड (53.6 µg/m³) चौथे और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (50.2 µg/m³) पांचवें स्थान पर रहा.
शहरों की रैंकिंग: लोनी (भारत) दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर
भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का लोनी (गाजियाबाद) शहर 2025 में दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बनकर उभरा है. यहाँ वार्षिक औसत PM2.5 स्तर 112.5 µg/m³ दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 23% अधिक है. यह स्तर WHO के सुरक्षित मानक (5 µg/m³) से 22 गुना से भी अधिक है.

रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 25 सबसे प्रदूषित शहर केवल तीन देशों—भारत, पाकिस्तान और चीन में स्थित हैं. इनमें से सबसे अधिक शहर भारत के हैं. वहीं, दक्षिण अफ्रीका का न्युउडुविले मात्र 1.0 µg/m³ के साथ दुनिया का सबसे स्वच्छ शहर रहा.
भारत की स्थिति: सुधार की धीमी रफ़्तार
2025 में भारत दुनिया का छठा सबसे प्रदूषित देश रहा. भारत का राष्ट्रीय औसत PM2.5 स्तर 48.9 µg/m³ दर्ज किया गया, जो 2024 (50.6 µg/m³) के मुकाबले 3% की गिरावट दर्शाता है.
दिल्ली का हाल
राजधानी दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में 8% की कमी आई है, लेकिन यह अब भी दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में शीर्ष पर है. दिल्ली को अप्रैल में आए भारी धूल भरे तूफान और दिसंबर की भीषण सर्दियों के दौरान गंभीर स्मॉग का सामना करना पड़ा. दिसंबर में दिल्ली में PM2.5 का स्तर सामान्य से 44% अधिक रहा.
जनता का गुस्सा और विरोध प्रदर्शन
नवंबर 2025 में दिल्ली की हवा इतनी जहरीली हो गई कि PM2.5 का स्तर 460 µg/m³ तक पहुंच गया. इसके विरोध में सैकड़ों लोग इंडिया गेट पर जमा हुए, जिनके हाथों में “I miss breathing” जैसे नारे लिखे पोस्टर थे. लोगों ने सरकार से केवल अस्थायी समाधान (जैसे स्कूल बंद करना या निर्माण रोकना) के बजाय ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाने की मांग की.

जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
रिपोर्ट में यह साफ किया गया है कि जंगल की आग अब वैश्विक प्रदूषण का एक बड़ा कारण बन चुकी है. 2025 में कनाडा की भीषण आग ने न केवल उत्तरी अमेरिका बल्कि यूरोप के देशों (जैसे स्विट्जरलैंड और ग्रीस) की हवा को भी खराब कर दिया. कनाडा के इतिहास में यह दूसरा सबसे खराब जंगल की आग का सीजन था.
अमेरिका में एल पासो (टेक्सास) सबसे प्रदूषित शहर रहा, जहाँ धूल भरे तूफानों के कारण प्रदूषण में 46% का उछाल आया. इसके विपरीत, सिएटल लगातार दूसरे साल अमेरिका का सबसे साफ प्रमुख शहर बना रहा.
यूरोप और अन्य क्षेत्रों का रुझान
यूरोप में प्रदूषण के मिले-जुले रुझान देखे गए. जहाँ 23 देशों में प्रदूषण बढ़ा, वहीं 18 देशों में कमी आई. माल्टा ने प्रदूषण कम करने में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया. ओशिनिया (जैसे ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड) दुनिया का सबसे स्वच्छ क्षेत्र बना रहा, जहाँ 61% शहरों ने WHO के मानकों का पालन किया.

निगरानी का संकट: डेटा गैप की चुनौती
रिपोर्ट में एक चिंताजनक मुद्दे की ओर भी ध्यान दिलाया गया है. मार्च 2025 में अमेरिकी विदेश विभाग के वैश्विक निगरानी कार्यक्रम के बंद होने से दुनिया के 44 देशों में वायु गुणवत्ता का डेटा मिलना मुश्किल हो गया है. इससे स्थानीय समुदायों और नीति निर्माताओं के पास वायु प्रदूषण से लड़ने के लिए सटीक जानकारी का अभाव हो गया है.
नीतिगत खामियां और समाधान की जरूरत
भारत के संदर्भ में रिपोर्ट बताती है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का अधिकांश पैसा (64%) केवल ‘सड़क की धूल’ कम करने पर खर्च किया जा रहा है. औद्योगिक उत्सर्जन और वाहनों के धुएं जैसे गंभीर कारणों पर केवल 1% से 13% फंड ही खर्च हो रहा है.
IQAir की 2025 की रिपोर्ट एक चेतावनी है कि प्रदूषण अब सीमाओं में बंधा नहीं है. चाहे वह पराली जलना हो, जंगल की आग हो या औद्योगिक धुआं—यह पूरी दुनिया की सेहत के लिए खतरा है. रिपोर्ट का संदेश साफ है: हमें केवल धूल साफ करने पर नहीं, बल्कि कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा.


