धनबाद: झारखंड के धनबाद स्थित Indian Institute of Technology (Indian School of Mines), Dhanbad के भौतिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है. विभाग के INSPIRE फैकल्टी डॉ. शेख रियाजुद्दीन और उनकी टीम ने ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए कम लागत वाला और प्रभावी इलेक्ट्रोड मैटेरियल तैयार किया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत को काफी कम करने में मदद करेगी और इसे आम लोगों और उद्योगों के लिए सुलभ बना सकेगी.
डॉ. शेख रियाजुद्दीन ने बताया कि भारत सरकार ने वर्ष 2023 में National Green Hydrogen Mission की शुरुआत की है. इस मिशन का मुख्य उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की लागत को कम करना और देश को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है. उन्होंने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में जिस मैटेरियल का इस्तेमाल होता है, वही सबसे महंगा हिस्सा होता है. अगर उस मैटेरियल की कीमत कम हो जाए, तो ग्रीन हाइड्रोजन सस्ती हो सकती है. उनकी टीम ने इसी दिशा में लगातार डेढ़ साल तक शोध किया और आखिरकार एक नया मैटेरियल तैयार करने में सफलता पाई.
इस शोध कार्य में भौतिकी विभाग की पीएचडी छात्रा प्रियदर्शनी तामंग और उमर सुल्ताना ने भी अहम भूमिका निभाई. टीम ने कम लागत वाले और आसानी से मिलने वाले तत्वों मोलिब्डेनम, वैनेडियम, सल्फर और कार्बन का उपयोग कर एक नया कैटेलिस्ट तैयार किया है. कार्बन, जिसमें ग्रेफीन और ग्रेफाइट शामिल हैं, काफी सस्ता होता है. इसकी कीमत लगभग 60 रुपये प्रति किलो बताई जाती है. वैज्ञानिकों के अनुसार यह नया मैटेरियल पानी को तोड़कर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अलग करने की प्रक्रिया को तेज करता है और कम ऊर्जा में बेहतर परिणाम देता है.
वर्तमान समय में ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए प्लेटिनम, पैलेडियम और रूथेनियम जैसे महंगे धातुओं का उपयोग किया जाता है. ये धातुएं भारत में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं और इन्हें बाहर के देशों, जैसे चीन और दक्षिण अफ्रीका से मंगाना पड़ता है. यही वजह है कि ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत अभी लगभग 500 रुपये प्रति लीटर या उससे अधिक है. डॉ. रियाजुद्दीन का दावा है कि उनके द्वारा विकसित मैटेरियल से तैयार ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत 50 रुपये प्रति लीटर से भी कम हो सकती है. यदि ऐसा संभव हुआ, तो यह ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति साबित होगी.

2030 तक हर साल 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य
भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक हर साल 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा है. इस दिशा में सरकार लगातार प्रयास कर रही है. वर्ष 2026 के बजट में भी इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए अलग से फंड का प्रावधान किया गया है. यह प्रोजेक्ट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और INSPIRE कार्यक्रम के सहयोग से चलाया जा रहा है.

ग्रीन हाइड्रोजन स्वच्छ ईंधन
ग्रीन हाइड्रोजन को स्वच्छ ईंधन माना जाता है. पेट्रोल और डीजल के उपयोग से कार्बन डाई ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाती हैं. इसके विपरीत, ग्रीन हाइड्रोजन के उपयोग से ऐसी जहरीली गैसों का उत्सर्जन नहीं होता. इसके जलने पर केवल पानी बनता है, जिससे पर्यावरण सुरक्षित रहता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में वाहनों और मशीनों में ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल बढ़ेगा और इससे बेहतर माइलेज भी मिल सकेगा.

बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने की उम्मीद
आईआईटी आईएसएम द्वारा तैयार किया गया यह नया मैटेरियल अंतरराष्ट्रीय जर्नल Small (वाइली, 2026) में प्रकाशित हुआ है. इससे संस्थान और देश दोनों का नाम रोशन हुआ है. अब इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए किसी औद्योगिक कंपनी के साथ समझौता करने की कोशिश की जा रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इंडस्ट्री का सहयोग मिलने पर बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया जा सकता है.

10 से 15 वर्षों में सड़कों के किनारे बनेंगे ग्रीन हाइड्रोजन पंप
डॉ. रियाजुद्दीन का मानना है कि आने वाले 10 से 15 वर्षों में जैसे आज पेट्रोल और डीजल पंप दिखाई देते हैं, वैसे ही सड़कों के किनारे ग्रीन हाइड्रोजन पंप भी नजर आएंगे. यदि यह तकनीक सफलतापूर्वक बड़े स्तर पर लागू होती है, तो भारत ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.


