नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की महत्वपूर्ण बैठक अगले सप्ताह 6 अप्रैल से 8 अप्रैल के बीच होने जा रही है. बाजार विशेषज्ञों और हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय बैंक इस बार भी नीतिगत ब्याज दरों (रेपो रेट) में कोई बदलाव नहीं करेगा. हालांकि, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतों में आई अस्थिरता ने नीति निर्माताओं के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है.
HSBC की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
HSBC ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जब तक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर स्थिर नहीं हो जातीं, तब तक RBI द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना कम है. रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि साल 2026 में तेल की औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो दरों में बढ़ोतरी की कोई आवश्यकता नहीं होगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की विनिमय दर को बचाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महंगा साबित हो सकता है. यदि ऊंचे तेल दामों के कारण आर्थिक विकास की गति (Growth) धीमी होती है, तो यह स्थिति अधिक जटिल हो जाएगी.
महंगाई बनाम विकास का संतुलन
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि मौजूदा ऊर्जा संकट पिछले तेल संकटों से अलग है. इस बार न केवल कीमतें बढ़ी हैं, बल्कि आपूर्ति में भी बाधाएं देखी जा रही हैं. यदि यह संकट कुछ और हफ्तों तक बना रहता है, तो विकास दर पर इसका बुरा असर महंगाई के दबाव से कहीं अधिक होगा. ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था का हाल 2022 के तेल संकट के बजाय कोरोना महामारी के समय जैसा हो सकता है, जहाँ विकास को बचाना प्राथमिक चुनौती थी.
HSBC के मॉडल के अनुसार, यदि तेल 100 डॉलर से नीचे रहता है, तो महंगाई दर RBI के 6 प्रतिशत के ऊपरी संतोषजनक स्तर के भीतर बनी रहेगी. लेकिन, यदि कीमतें इससे ऊपर बनी रहती हैं, तो महंगाई बेकाबू हो सकती है, जिससे RBI को मजबूरन दरें बढ़ानी पड़ेंगी.
RBI ने हाल ही में 27 मार्च को बैंकों के विदेशी मुद्रा व्यापार से जुड़े नियमों को सख्त किया है, जिससे बाजार में अटकलें तेज हो गई थीं कि क्या दरों में भी बढ़ोतरी होगी. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि दरों में बढ़ोतरी का फैसला लेना फिलहाल जल्दबाजी होगी. नीति निर्माताओं को सलाह दी गई है कि वे मांग को प्रोत्साहित करने के बजाय आपूर्ति बाधाओं को दूर करने पर ध्यान दें, ताकि 2021-22 जैसी ‘स्टिकी इन्फ्लेशन’ (जिद्दी महंगाई) की स्थिति पैदा न हो.


