Saturday, October 31, 2026

Google Project Suncatcher: अंतरिक्ष में पहली बार AI ने लिखी कविता, सैटेलाइट ने पृथ्वी पर भेजा जवाब

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टेक डेस्क | 31 अक्टूबर 2026 | Bharat Superfast News

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अंतरिक्ष में संचालित करने की दिशा में Google ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी प्रयोग किया है। कंपनी के Project Suncatcher प्रोटोटाइप सैटेलाइट ने पृथ्वी की कक्षा में AI मॉडल चलाकर एक कविता तैयार की और उसका जवाब वापस ग्राउंड स्टेशन तक भेजा। इस प्रयोग में Google की Tensor Processing Unit (TPU) चिप का इस्तेमाल किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह पहली बार है जब अंतरिक्ष में डेटा सेंटर के लिए इस्तेमाल होने वाली श्रेणी की AI चिप पर सफलतापूर्वक AI इन्फरेंस चलाया गया। यह प्रयोग भविष्य में अंतरिक्ष आधारित कंप्यूटिंग की संभावनाओं को समझने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

क्या है Google का Project Suncatcher?

Project Suncatcher Google का एक शोध कार्यक्रम है। इसके तहत कंपनी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या भविष्य में पृथ्वी पर मौजूद बड़े डेटा सेंटरों के बजाय अंतरिक्ष में सैटेलाइट के जरिए AI कंप्यूटिंग की जा सकती है।

आज AI सेवाओं को चलाने के लिए बड़े डेटा सेंटरों की जरूरत पड़ती है। इन केंद्रों को भारी मात्रा में बिजली और कूलिंग व्यवस्था की आवश्यकता होती है। Google का शोध यह जांच रहा है कि क्या सैटेलाइट आधारित कंप्यूटिंग इस क्षेत्र में एक वैकल्पिक व्यवस्था बन सकती है।

हालांकि, अभी यह शुरुआती प्रयोग है। इसे बड़े स्तर पर व्यावसायिक उपयोग के लिए तैयार तकनीक नहीं माना जा सकता।

चार TPU चिप्स से लैस है प्रोटोटाइप सैटेलाइट

ETV Bharat की रिपोर्ट के अनुसार, Project Suncatcher के प्रोटोटाइप सैटेलाइट में Google की चार Tensor Processing Unit यानी TPU चिप्स लगाई गई हैं। ये विशेष रूप से AI मॉडल के संचालन के लिए तैयार की गई प्रोसेसर चिप्स हैं।

सैटेलाइट की बिजली उत्पादन क्षमता लगभग एक किलोवाट बताई गई है। बिजली की सीमित उपलब्धता के कारण एक समय में केवल एक TPU चलाया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रत्येक ऑर्बिटल पास के दौरान यह चिप लगभग 20 मिनट तक काम कर सकती है।

इस सीमा का असर सैटेलाइट के कामकाज और ग्राउंड स्टेशन के साथ डेटा के आदान-प्रदान पर पड़ता है।

लॉन्च के बाद तीन सप्ताह तक हुई तकनीकी जांच

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रोटोटाइप सैटेलाइट को 1 अक्टूबर 2026 को SpaceX के Falcon 9 रॉकेट से लॉन्च किया गया था। इसके बाद Google की टीम ने करीब तीन सप्ताह तक सैटेलाइट के सिस्टम और अलग-अलग सबसिस्टम की जांच की।

इस प्रक्रिया में ऑनबोर्ड कंप्यूटर को सक्रिय करना, हार्डवेयर की कार्यक्षमता परखना और शुरुआती मशीन लर्निंग कार्यों को चलाना शामिल था।

सिस्टम के ठीक से काम करने का भरोसा मिलने के बाद टीम ने सैटेलाइट पर मौजूद AI मॉडल को पहला वास्तविक निर्देश भेजा।

अंतरिक्ष से आया ‘Hello World’ जैसा जवाब

यह प्रयोग नॉर्वे के स्वालबार्ड स्थित ग्राउंड स्टेशन के संपर्क क्षेत्र से गुजरते समय किया गया। इंजीनियरों ने सैटेलाइट पर चल रहे Google DeepMind के ओपन AI मॉडल Gemma 4 को एक छोटी कविता यानी हाइकू लिखने का निर्देश दिया।

मॉडल ने अंतरिक्ष और पृथ्वी से जुड़ी कल्पना पर आधारित तीन पंक्तियों की कविता तैयार की। इसके बाद सैटेलाइट ने यह जवाब वापस पृथ्वी पर भेजा।

Google की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रयोग एक तरह से अंतरिक्ष में AI सिस्टम के सफल संचालन का शुरुआती प्रदर्शन था। इसके बाद टीम ने लिमरिक जैसी छोटी कविताओं और तकनीकी स्थिति से जुड़े टेलीमेट्री निर्देशों के जरिए भी सिस्टम का परीक्षण किया।

अंतरिक्ष में AI चिप्स के सामने रेडिएशन बड़ी चुनौती

अंतरिक्ष में AI चिप्स को संचालित करना आसान नहीं है। वहां मौजूद कॉस्मिक रेडिएशन कंप्यूटर हार्डवेयर और मेमोरी पर असर डाल सकता है।

रेडिएशन के कारण कंप्यूटर मेमोरी में बिटफ्लिप जैसी त्रुटियां हो सकती हैं। इसमें डेटा के किसी बिट की स्थिति बदल जाती है, जिससे जानकारी गलत हो सकती है या कंप्यूटिंग प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

Google ने अपने TPU चिप्स को पृथ्वी पर पार्टिकल एक्सेलेरेटर की मदद से रेडिएशन संबंधी परिस्थितियों में जांचा है। लेकिन अंतरिक्ष का वास्तविक वातावरण अलग होता है। इसलिए कक्षा में किए जा रहे परीक्षणों से यह समझने में मदद मिलेगी कि रेडिएशन का चिप्स के प्रदर्शन पर कितना असर पड़ता है।

AI मॉडल चलाना और ट्रेनिंग करना अलग चुनौती

शुरुआती परीक्षणों से संकेत मिला है कि रेडिएशन का पहले से तैयार AI मॉडल को चलाने यानी इन्फरेंस पर सीमित असर हो सकता है। हालांकि, नए AI मॉडल की ट्रेनिंग के दौरान रेडिएशन अधिक चुनौती पैदा कर सकता है।

इन्फरेंस में पहले से प्रशिक्षित मॉडल किसी सवाल या निर्देश का जवाब तैयार करता है, जबकि ट्रेनिंग में मॉडल को नए डेटा से सीखने के लिए तैयार किया जाता है।

इसलिए Google के सामने केवल अंतरिक्ष में AI चलाने की ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक हार्डवेयर को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाए रखने की चुनौती भी है।

क्या भविष्य में अंतरिक्ष में बनेंगे AI डेटा सेंटर?

Project Suncatcher अभी शोध और परीक्षण के शुरुआती चरण में है। इस प्रयोग से यह जरूर पता चला है कि सीमित बिजली और अंतरिक्ष के कठिन वातावरण के बावजूद सैटेलाइट पर AI मॉडल चलाकर जवाब पृथ्वी तक भेजा जा सकता है।

भविष्य में ऐसी तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है या नहीं, यह बिजली उत्पादन, रेडिएशन से सुरक्षा, तापमान नियंत्रण और सैटेलाइट के बीच तेज संचार जैसी चुनौतियों के समाधान पर निर्भर करेगा।

फिलहाल, Google का यह प्रयोग अंतरिक्ष आधारित कंप्यूटिंग की संभावनाओं को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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