नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में 12 सितंबर से नई दिल्ली में BRICS Summit 2026 की शुरुआत होने जा रही है। शिखर सम्मेलन को लेकर भारतीय उद्योग जगत की उम्मीदें काफी बढ़ी हुई हैं। कारोबारी संगठनों का मानना है कि इस बार BRICS के मंच से केवल नीतिगत चर्चाएं ही नहीं, बल्कि व्यापार को आसान बनाने और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने से जुड़े ठोस फैसले भी सामने आने चाहिए।
भारतीय उद्योगों के सामने फिलहाल दो प्रमुख मुद्दे हैं। पहला, BRICS देशों के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को कम करना और दूसरा, वैश्विक परिस्थितियों के बीच देश की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करना।
पांच साल में दोगुने से ज्यादा हुआ कारोबार
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) और वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत और BRICS देशों के बीच कुल व्यापार वित्त वर्ष 2021 के 203.1 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 417.5 अरब डॉलर हो गया। यानी पांच साल के दौरान कारोबार दोगुने से भी ज्यादा बढ़ा।
हालांकि, व्यापार बढ़ने के साथ भारत का घाटा भी काफी तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2021 में जहां व्यापार घाटा 74.5 अरब डॉलर था, वहीं वित्त वर्ष 2026 में यह बढ़कर 226.1 अरब डॉलर हो गया।
आयात तेजी से बढ़ा, निर्यात की रफ्तार पीछे
आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों में BRICS देशों से भारत का आयात 131.8 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि निर्यात में 48.8 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई।
वर्तमान में भारत के कुल आयात में BRICS देशों की हिस्सेदारी करीब 41.5 प्रतिशत है। इसके मुकाबले भारत के कुल निर्यात में इन देशों की हिस्सेदारी 21.7 प्रतिशत है। उद्योग जगत के लिए यही असंतुलन सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, BRICS देशों से होने वाले भारत के आयात में चीन, यूएई और रूस की हिस्सेदारी बेहद महत्वपूर्ण है। इन तीन देशों से ही भारत के BRICS आयात का करीब 84 प्रतिशत हिस्सा आता है।
कारोबार की बाधाएं कम करने की मांग
PHDCCI के अध्यक्ष राजीव जुनेजा का कहना है कि BRICS को व्यापार के क्षेत्र में संवाद से आगे बढ़कर प्रभावी व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है। उनके अनुसार, सदस्य देशों के बीच व्यापारिक अड़चनों को दूर करने के लिए एक ऐसा तंत्र होना चाहिए, जहां कारोबारी बाधाओं का तेजी से समाधान किया जा सके।
भारतीय उद्योग कस्टम प्रक्रियाओं को आसान बनाने, बार-बार होने वाली जांच कम करने और अलग-अलग देशों के नियमों को अधिक सरल एवं व्यावहारिक बनाने की मांग कर रहे हैं। उद्योगों का यह भी मानना है कि सदस्य देश अपनी-अपनी विशेषज्ञता के अनुसार उत्पादन करें तो लागत कम करने और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
व्यापार असंतुलन दूर करने पर जोर
CareEdge Ratings के सीनियर डायरेक्टर रंजन शर्मा के मुताबिक, भारतीय कंपनियां BRICS सम्मेलन से रणनीतिक चर्चाओं को वास्तविक कारोबारी लाभ में बदलने की उम्मीद कर रही हैं।
उनके अनुसार, कस्टम क्लीयरेंस में तेजी, गैर-टैरिफ बाधाओं में कमी और मानकों की पारस्परिक मान्यता जैसे कदम व्यापार को आसान बना सकते हैं। साथ ही भारत के कुछ प्रमुख BRICS साझेदारों के साथ मौजूद व्यापार असंतुलन को कम करना भी जरूरी है।
निवेश के मोर्चे पर भी भारतीय उद्योग चाहते हैं कि पूंजी और तकनीक का दोतरफा प्रवाह बढ़े। इससे भारतीय कंपनियां केवल आयातक या खरीदार की भूमिका तक सीमित रहने के बजाय BRICS की उत्पादन और वैल्यू चेन में अधिक सक्रिय भागीदारी कर सकेंगी।
महंगे कच्चे तेल के बीच ऊर्जा सुरक्षा अहम
पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुकी हैं।
ऐसे माहौल में भारतीय उद्योग रूस, यूएई और सऊदी अरब जैसे BRICS साझेदारों के साथ दीर्घकालिक तेल आपूर्ति समझौतों पर जोर दे रहे हैं। उद्योग जगत का मानना है कि स्थिर कीमतों और भरोसेमंद आपूर्ति की व्यवस्था ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकती है।
नए बाजारों तक पहुंच बनाने की उम्मीद
भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाजारों की तलाश भी सम्मेलन का एक अहम मुद्दा है। हाल के समय में टैरिफ संबंधी बदलावों के कारण कुछ बड़े निर्यात बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी है।
ऐसे में BRICS के जरिए अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र और लैटिन अमेरिकी बाजारों तक भारतीय कंपनियों की पहुंच बढ़ाने की संभावना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्थानीय मुद्राओं में भुगतान पर जोर
अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर पर निर्भरता और बैंकिंग शुल्क छोटे एवं मध्यम कारोबारियों के लिए बड़ी चुनौती है। रंजन शर्मा के मुताबिक, BRICS साझेदारों के बीच स्थानीय या राष्ट्रीय मुद्राओं में लेनदेन को बढ़ावा देने पर चर्चा हो सकती है।
ऐसी व्यवस्था से सीमा पार भुगतान की लागत घटाने में मदद मिल सकती है। साथ ही भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर यानी DPI मॉडल को अन्य साझेदार देशों तक ले जाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा सकता है।
MSMEs के लिए खुल सकते हैं नए अवसर
India SME Forum के अध्यक्ष विनोद कुमार के अनुसार, BRICS सहयोग से छोटे और मध्यम उद्योगों को सबसे ज्यादा फायदा मिलने की संभावना है।
उनका कहना है कि बेहतर व्यापारिक नेटवर्क के जरिए MSMEs को विदेशी खरीदारों और कारोबारी साझेदारों तक पहुंच मिल सकती है। इसके अलावा BRICS सप्लाई चेन में भागीदारी, ट्रेड फाइनेंस, सर्टिफिकेशन, संयुक्त उपक्रम और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं।
छोटे कारोबारियों के लिए तेज और कम लागत वाला सीमा पार भुगतान भी महत्वपूर्ण है। बैंकिंग शुल्क घटाने और जटिल कोरस्पोंडेंट बैंकिंग पर निर्भरता कम करने की दिशा में सहयोग से MSMEs को राहत मिल सकती है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष समेत वैश्विक मुद्दों पर भी नजर
BRICS सम्मेलन का एजेंडा सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी चर्चा के केंद्र में रहने की उम्मीद है।
Engineering Export Promotion Council India (EEPC India) के चेयरमैन अरुण कुमार गरोड़िया के मुताबिक, यदि सम्मेलन सदस्य देशों के बीच बेहतर समन्वय बढ़ाने और रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे प्रमुख वैश्विक मुद्दों के समाधान की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाता है, तो यह सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि होगी।
डॉलर की भूमिका कम करने के मुद्दे पर उनका मानना है कि BRICS के भीतर इस पर चर्चा संभव है, लेकिन तत्काल किसी बड़े और कठोर फैसले की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी।
उद्योग जगत की नजर सम्मेलन के नतीजों पर
भारतीय उद्योग जगत की अपेक्षा है कि BRICS अब केवल राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत का मंच न रहकर व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग के लिए ज्यादा प्रभावी प्लेटफॉर्म बने।
शिखर सम्मेलन के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सदस्य देश व्यापार बाधाओं को कम करने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने, MSMEs को वैश्विक बाजार से जोड़ने और भारत के बढ़ते व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए कितने ठोस कदम उठाते हैं।
