Monday, October 5, 2026

Bihar MLC Election: वित्त रहित शिक्षक बन सकते हैं अहम वोट बैंक, सभी दलों की नजर.

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पटना: बिहार विधान परिषद चुनाव के बीच वित्त रहित और अनुदानित शिक्षण संस्थानों के शिक्षक एवं कर्मचारियों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। वर्षों से वेतन, अनुदान, सेवा शर्त और पेंशन जैसी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे इन शिक्षकों की संख्या बड़ी है। ऐसे में शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में उनका रुख चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

40 हजार से अधिक शिक्षक-कर्मी प्रभावित

राज्य के वित्त रहित और अनुदानित स्कूल-कॉलेजों में बड़ी संख्या में शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी कार्यरत हैं। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2025 में 225 वित्त रहित डिग्री कॉलेजों में करीब 15 हजार शिक्षक-कर्मी बताए गए थे।

इसके अलावा 625 वित्त अनुदानित हाईस्कूल और 599 इंटर कॉलेजों में 25 हजार से अधिक शिक्षक-कर्मियों का उल्लेख किया गया था। इस तरह इन संस्थानों से जुड़े कर्मचारियों की संख्या 40 हजार से ज्यादा बताई जाती है।

नियमित वेतन की जगह अनुदान पर निर्भरता

वित्त रहित संस्थानों के शिक्षकों को सरकारी शिक्षकों की तरह नियमित मासिक वेतन नहीं मिलता। उनकी आय सरकार से मिलने वाले अनुदान पर निर्भर रहती है, जिसका भुगतान संस्थान और छात्रों के परिणाम से जुड़े प्रावधानों के आधार पर किया जाता है।

शिक्षक संगठनों की ओर से लंबे समय से शिकायत की जाती रही है कि अनुदान मिलने में देरी के कारण वेतन भुगतान भी प्रभावित होता है। सेवा सुरक्षा, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और अन्य सुविधाओं को लेकर भी शिक्षक अपनी मांगें उठाते रहे हैं।

461 करोड़ रुपये के अनुदान की घोषणा

वित्त रहित शिक्षकों के मुद्दे पर हाल में राज्य सरकार की ओर से 461 करोड़ रुपये के सहायक अनुदान की घोषणा की गई। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 19 सितंबर को इसकी जानकारी दी थी। सरकार के अनुसार यह राशि वित्त रहित और अनुदानित स्कूल-कॉलेजों के शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों के भुगतान के लिए है।

वित्त रहित शिक्षक डॉ. ललन प्रसाद के मुताबिक कई वर्षों से अनुदान का भुगतान नहीं होने के कारण शिक्षकों के सामने आर्थिक समस्याएं बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि संस्थानों के सीमित संसाधनों में कर्मचारियों का भुगतान और संस्थान का संचालन दोनों करना मुश्किल होता है।

वेतनमान और पेंशन पर भी समिति

सरकार की ओर से वित्त रहित शिक्षकों की समस्याओं के समाधान के लिए उच्च स्तरीय समीक्षा समिति बनाए जाने की जानकारी भी दी गई है। इसका उद्देश्य वेतनमान समेत अन्य लंबित मुद्दों पर विचार करना बताया गया है।

जदयू नेता और विधान पार्षद डॉ. संजीव सिंह ने कहा कि सरकार वित्त रहित शिक्षकों की स्थिति सुधारने की दिशा में काम कर रही है। उनके अनुसार नियमित वेतन और पेंशन से जुड़े विषयों पर भी विचार किया जा रहा है।

भाजपा नेता और विधान पार्षद नवल किशोर यादव ने भी कहा कि सरकार ने शिक्षकों की समस्याओं पर ध्यान दिया है और बाकी मुद्दों के समाधान की दिशा में काम किया जा रहा है।

चुनावी मैदान में शिक्षकों की भूमिका पर चर्चा

विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में वित्त रहित शिक्षक भी मतदाता होते हैं। इसी वजह से चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक दल और उम्मीदवार इस वर्ग की मांगों और समस्याओं को लेकर सक्रिय नजर आ रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी का कहना है कि चुनाव के समय शिक्षकों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से सामने आते हैं। उनके अनुसार सरकार की हालिया घोषणाओं से शिक्षकों में उम्मीद पैदा हुई है, लेकिन चुनाव में इसका असर किस रूप में दिखाई देगा, यह मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।

वित्त रहित शिक्षक फिलहाल नियमित वेतनमान, लंबित अनुदान, सेवा शर्त, पेंशन और सेवानिवृत्ति से जुड़ी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। ऐसे में विधान परिषद चुनाव के दौरान इन मुद्दों पर होने वाली राजनीतिक गतिविधियां और शिक्षकों का मतदान महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना हुआ है।

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