नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए अधिशेष टूटे चावल के उपयोग से खाद्य महंगाई में कोई वृद्धि नहीं हुई है। सरकार का कहना है कि चावल का आवंटन तभी किया जाता है जब देश की खाद्य सुरक्षा जरूरतें और आवश्यक बफर स्टॉक पूरी तरह सुनिश्चित हो जाएं।
लोकसभा में एक लिखित जवाब में खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री निमुबेन जयंतीभाई बांभनिया ने बताया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) और अन्य सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की जरूरतों को पूरा करने के बाद ही अतिरिक्त चावल इथेनॉल उत्पादन के लिए उपलब्ध कराया जाता है।
अधिशेष अनाज का ही किया जाता है उपयोग
सरकार के अनुसार, भारतीय खाद्य निगम (FCI) के केंद्रीय भंडार से केवल वही चावल खुले बाजार बिक्री योजना (OMSS) के तहत जारी किया जाता है, जो आवश्यक भंडारण सीमा से अधिक होता है। इसी अतिरिक्त स्टॉक का उपयोग बाद में इथेनॉल निर्माण के लिए किया जाता है।
मक्का बना प्रमुख विकल्प
सरकार ने यह भी बताया कि इथेनॉल उत्पादन में मक्का की बढ़ती हिस्सेदारी से किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार मिला है। वर्ष 2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक देश में लगभग 55 मिलियन टन मक्का उत्पादन का अनुमान है, जो इथेनॉल उद्योग, पशु आहार, पोल्ट्री और अन्य घरेलू आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त माना गया है।
पोल्ट्री और पशुपालन क्षेत्र में भी चावल की भूसी, टूटे चावल, बाजरा और गेहूं के चोकर जैसे वैकल्पिक चारे का उपयोग बढ़ रहा है, जिससे आपूर्ति संतुलित बनी हुई है।
इथेनॉल कार्यक्रम से जुड़े प्रमुख आंकड़े
सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2024-25 में करीब 13.1 मिलियन टन मक्का का उपयोग इथेनॉल उत्पादन में किया गया। इसी अवधि में एफसीआई के पास लगभग 3.18 मिलियन टन अधिशेष चावल उपलब्ध था। वर्तमान में देश में इथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और चावल से किया जाता है।
सरकार ने गिनाए आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ
केंद्र सरकार के मुताबिक, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम से देश को कई स्तरों पर लाभ मिला है।
- आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटने से 1.90 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई।
- किसानों को नई मांग मिलने से उनकी आय में करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि दर्ज की गई।
- इथेनॉल मिश्रण के कारण 930 लाख मीट्रिक टन से अधिक कार्बन उत्सर्जन में कमी आने का दावा किया गया है।
सरकार का कहना है कि यह कार्यक्रम ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
