भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में क्रांति लाने के बाद अब देश के सबसे अमीर कारोबारी मुकेश अंबानी की नजरें अंतरिक्ष पर हैं. रिलायंस जियो ने एलन मस्क की कंपनी ‘स्टारलिंक’ (Starlink) के वैश्विक दबदबे को सीधी चुनौती देने की पूरी तैयारी कर ली है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जियो ने अंतरिक्ष नियामक संस्था IN-SPACe को एक बड़ा प्रस्ताव सौंपा है, जिसके तहत कंपनी पृथ्वी की निचली कक्षा (Low-Earth Orbit – LEO) में अपने 1,600 से 1,650 सैटेलाइट्स लॉन्च करने की योजना बना रही है.
मस्क के साम्राज्य को टक्कर, 2-3 साल में लॉन्चिंग
अब तक सैटेलाइट इंटरनेट की दुनिया में अमेरिकी अरबपति एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक का एकछत्र राज रहा है. मस्क के करीब 10,000 सैटेलाइट पहले से अंतरिक्ष में मौजूद हैं. लेकिन अब मुकेश अंबानी अगले 2 से 3 सालों के भीतर अपना खुद का सैटेलाइट नेटवर्क खड़ा करने जा रहे हैं. अगर सरकार से इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है, तो रिलायंस जियो LEO सैटेलाइट स्पेस में कदम रखने वाली पहली भारतीय कंपनी बन जाएगी. इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए करीब ₹95,000 करोड़ से ₹1.41 लाख करोड़ ($10-$15 बिलियन) के भारी-भरकम निवेश का अनुमान है.
क्या होगा आम जनता को फायदा?
जियो की इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) कनेक्टिविटी होगा. इसका मतलब है कि बिना किसी मोबाइल टावर, डिश एंटिना या केबल के, सीधे आपके सामान्य स्मार्टफोन पर हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इंटरनेट और कॉलिंग सिग्नल मिलेंगे. भारत के वो दुर्गम इलाके—जैसे ऊंचे पहाड़, घने जंगल, रेगिस्तान और सुदूर गांव जहां आज भी मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंच पाया है—वहां भी जियो के सैटेलाइट के जरिए रॉकेट जैसी इंटरनेट स्पीड मिलेगी.
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों जरूरी है जियो की एंट्री?
भारत सरकार के लिए यह प्रोजेक्ट बेहद महत्वपूर्ण है. राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा संप्रभुता के लिहाज से विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है. सरकार चाहती है कि भारत की सीमा के भीतर इस्तेमाल होने वाला सैटेलाइट इंटरनेट पूरी तरह सुरक्षित हो और उसके सिग्नल्स पड़ोसी देशों की सीमाओं को पार न करें (जियो फेंसिंग). एक भारतीय कंपनी होने के नाते जियो सरकार की इन सभी सख्त शर्तों को आसानी से पूरा कर सकती है. इसी वजह से सरकार जियो को इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (ITU) से अंतरिक्ष में ऑर्बिटल स्लॉट दिलाने में पूरी मदद करेगी.


