आरआरआर स्टार राम चरण और बॉलीवुड एक्ट्रेस जाह्नवी कपूर स्टारर स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म पेद्दी विवादों में है. फिल्म में सीन में जाह्नवी कपूर को ऑब्जेक्टिफाई किया गया है. इसका मतलब है कि एक्ट्रेस के फिजिक्यू को लेकर कुछ ऐसे सीन दिखाए गए हैं, जो दर्शकों को पसंद नहीं आ रहे हैं. सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर खूब हल्ला हो रहा और कहा जा रहा है कि ‘औरत को एक चीज’ बनाकर रख दिया है. हालांकि भारी विरोध के चलते फिल्म के डायरेक्टर बुची बाबू सना ने जाह्नवी के इन आपत्तिजनक सीन को हटा लिया है. लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता है, क्योंकि इससे पहले भी कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों में महिला के किरदार को ‘ऑब्जेक्ट मटेरियल’ शो किया है.
क्या है पूरा मामला?
बता दें, दिवगंत दिग्गज एक्ट्रेस श्रीदेवी की बड़ी बेटी को राम चरण की फिल्म ‘पेद्दी’ में एक ग्लैमरस, अति-कामुक प्रेमिका के रूप में दिखाया गया है. फिल्म निर्माताओं ने बार-बार कैमरे का फोकस उनकी नाभि पर केंद्रित किया, उनके कर्व्स को उभारने वाले एंगल का इस्तेमाल किया और स्लो-मोशन में उनके शरीर को दिखाया. पेद्दी के साथ उसका रोमांस आधी रात को बिना सहमति के किए गए चुंबन पर आधारित है, जिससे एक्ट्रेस का कैरेक्टर एक तमाशा नजर आता है.
इससे पहले कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों में इस तरह का काम देखा गया है. जूनियर एनटीआर के साथ तेलुगु फिल्म देवरा में जाह्नवी के डेब्यू के साथ भी ऐसा ही हुआ. उनके किरदार थंगम के बहुत ही कम सीन थे और सिर्फ एक गाना ‘चुट्टमल्ले’ था, जिसमें उन्हें सिर्फ सार्वजनिक रूप से दिखाया गया था.
इसी तरह, अल्लू अर्जुन की पुष्पा की दुनिया में महिलाओं के किरदारों को ज़्यादातर दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही निभाया गया है. नायक की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरणा देना या दर्शकों को लुभाने के लिए आकर्षक दिखना. चाहे वह श्रीवल्ली (रश्मिका मंदाना) का तुरंत समर्पण हो या भावनात्मक आवेश पैदा करने के लिए उसका अभिनय, पुष्पा को सर्वोच्च पुरुष दिखाने के लिए उसके आंतरिक जीवन को पूरी तरह से खोखला कर दिया गया है.
फिल्म का गाना ‘ऊ अंटावा’ शायद इस विरोधाभास का सबसे क्लियर उदाहरण है. गाने के बोल वास्तव में पुरुषों की उस हिंसक नजर की आलोचना करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें कहा गया है, ‘अरे, पुरुष हमें वस्तु की तरह देखते हैं, चाहे हम कुछ भी पहनें’. यह एक तीखा वार था.
यश और प्रशांत नील की ब्लॉकबस्टर ‘केजीएफ’को ही ले लीजिए, बेशक देखने में बेहद खूबसूरत, लेकिन इसमें महिलाओं को उसी कामुक नजरिए से दिखाया गया है, जहां उनके शारीरिक आकर्षण को कैरेक्टर से ज्यादा महत्व दिया गया. अभिनेत्री श्रीनिधि शेट्टी की रीना को एक जोशीली और आत्मनिर्भर महिला के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन वह जल्द ही ‘हीरो की प्रेमिका’ बनकर रह जाती है.
यहां तक कि ऋषभ शेट्टी की फिल्म ‘कंतारा 1‘, जिसे उसकी शानदार सांस्कृतिक जड़ों के लिए खूब तारीफ मिली, लेकिन इस फिल्म में भी महिला किरदार इससे अछूता नहीं रहा.
हमहाउसफुल जैसी कॉमेडी फिल्मों से यही उम्मीद करते हैं, जिन्होंने एक तरह से स्लैपस्टिक और आइटम नंबरों से ही एक कैटेगरी बना दी है, जिनमें एक्ट्रेस को सिर्फ शोपीस के रूप में पेश किया गया, लेकिन फिर आप नंदामुरी बालकृष्ण की फिल्मों (जिनमें 2025 की फिल्म डाकू महाराज और गाना दबिडी दिबिडी शामिल हैं ) को देखें, तो पाएंगे कि दशकों पुराना फॉर्मूला अभी भी बिना सोचे-समझे चल रहा है. वहीं, रणबीर कपूर की फिल्म एनिमल में रश्मिका मंदाना और बाकी अन्य महिला किरदारों को मर्द की ‘पैर की जूती’ की तरह शो किया गया है.
रश्मिका के साथ-साथ तृप्ति डिमरी के लिए फिल्म ‘एनिमल’ से एक बड़ी फिल्म साबित हुई, जहां संदीप रेड्डी वांगा के कैमरे ने उन्हें एक दबी हुई कैरेक्टर के रूप में पेश किया था, जिसका इस्तेमाल सिर्फ सनसनी फैलाने और पुरुषों को संतुष्ट करने के लिए किया गया था.


